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25.9.09

गोरखपुर में मज़दूर आंदोलन की जीत -- संयुक्‍त मज़दूर अधिकार संघर्ष मोर्चा की ओर से धन्‍यवाद ज्ञापन

प्रिय साथियो,

पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर गोरखपुर में चल रहे मज़दूर आंदोलन में आपकी दिलचस्‍पी और समर्थन के लिए हम इस पूरे इलाके के मज़दूरों की ओर से आपको धन्‍यवाद देना चाहते हैं। 52 दिनों तक चले हमारे आंदोलन के बाद कल शाम हमें जीत मिली। ज़ि‍लाधिकारी और उपश्रमायुक्‍त की मौजूदगी में हुए समझौते के तहत मॉडर्न लैमिनेटर्स लि. और माडर्न पैकेजिंग लि. के मालिकान 15 दिनों के अंदर न्‍यूनतम मज़दूरी, जॉब कार्ड व पे स्लिप देने, काम के घंटे कम करने, ई.एस.आई. आदि मज़दूरों की अधिकांश माँगों को लागू करेंगे। इस बीच दोनों फैक्ट्रियों में श्रम कानूनों के पालन पर नज़र रखने के लिए दो लेबर इंस्‍पेक्‍टर वहाँ तैनात रहेंगे। यदि इस अवधि में इन माँगों को लागू करने में हीला-हवाली होगी तो 15 दिन के बाद ज़ि‍लाधिकारी की अध्‍यक्षता में दुबारा वार्ता होगी।

हालांकि ऐसे संकेत अभी से मिल रहे हैं कि मालिकान इतनी आसानी से समझौते को लागू नहीं करेंगे और मज़दूरों को कदम-कदम पर लड़ना होगा। समझौते की अगली सुबह यानी आज ही फैक्‍ट्री गेट पर मालिकों की तरफ से लगे नोटिस में आंदोलन में अगुवा भूमिका निभाने वाले 18 मज़दूरों को ''बाहरी'' घोषित कर दिया गया और सैकड़ों मज़दूरों के ज़बर्दस्‍त विरोध प्रदर्शन के बाद ही उन्‍हें काम पर लिया गया। इसके बाद मैनेजमेंट ठेके पर काम करने वाले करीब 500 मज़दूरों को काम पर लेने से इंकार करने लगा। मज़दूरों के विरोध के बाद फैक्‍ट्री में पहुंचे उपश्रमायुक्‍त का घेराव करने के बाद जाकर उन्‍हें वापस लेने पर सहमति बनी।

हमारे आंदोलन के दौरान इसे बदनाम करने, मज़दूरों और मज़दूर नेताओं को डराने-धमकाने, फ़र्ज़ी मुकदमों में फँसाने की कोशिशों से लेकर मज़दूरों को थकाकर आंदोलन तोड़ने के लिए हर तरह के ह‍थकंडे अपनाए गए। इसने एक बार फिर यह दर्शा दिया कि देश के पिछड़े क्षेत्रों में जनवादी अधिकारों की क्‍या हालत है, खासकर मज़दूरों से जुड़े मसलों पर। मालिकान, प्रशासन और स्‍थानीय नेताओं के गँठजोड़ ने एकदम न्‍यायसंगत और कानूनसम्‍मत आंदोलन को भी तोड़ने के लिए जिस तरह का अर्द्धफ़ासिस्‍ट रुख अपनाया उसके ख़ि‍लाफ़ जनमत तैयार करने में गोरखपुर शहर और देश भर से विभिन्‍न संगठनों, कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों द्वारा प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री और ज़ि‍ला प्रशासन के नाम भेजे गए विरोधपत्रों, ज्ञापनों और बयानों की अहम भूमिका रही। इस समर्थन और सहयोग के लिए संयुक्‍त मज़दूर अधिकार संघर्ष समिति सभी आंदोलनरत मज़दूरों की ओर से आपको हार्दिक धन्‍यवाद देती है।

यहीं हम यह भी बताना चाहते हैं कि मज़दूरों की यह जीत आंशिक ही है। मज़दूरों की जुझारू एकजुटता और जनमत के चौतरफा दबाव में मालिकान ने थोड़ा समय लेने के लिए अभी समझौता कर लिया है, लेकिन विरोध का माहौल ठंडा होने पर वे इन्‍हें लागू करने से फिर मुकर सकते हैं और प्रशासन की मदद से अगुआ मज़दूरों को उत्‍पीड़न का शिकार बना सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो हम फिर आपको आवाज़ देंगे और आपको एक बार फिर हमारे साथ खड़ा होना होगा।

- संग्रामी अभिवादन के साथ,

संयुक्‍त मज़दूर अधिकार संघर्ष मोर्चा

2 कमेंट:

समयचक्र - महेंद्र मिश्र September 25, 2009 at 9:33 PM  

अच्छी खबर . इन्कलाब जिंदाबाद ...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi September 25, 2009 at 10:07 PM  

संघर्ष करने वाले सभी मजदूरों को सलाम! विजय पर बधाई! पर यह तो पहली लड़ाई थी। अभी और संघर्ष हैं। सब से बड़ा संघर्ष तो इस बात का है कि जो जीता गया है उस की रक्षा की जाए और जीत को आगे बढ़ाया जाए।

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बिगुल पुस्तिकाएं
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2. मकड़ा और मक्खी -- विल्हेल्म लीब्कनेख़्त

3. ट्रेडयूनियन काम के जनवादी तरीके -- सेर्गेई रोस्तोवस्की

4. मई दिवस का इतिहास -- अलेक्ज़ैण्डर ट्रैक्टनबर्ग

5. पेरिस कम्यून की अमर कहानी

6. बुझी नहीं है अक्टूबर क्रान्ति की मशाल

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