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2.11.09

गोरखपुर मजदूर आन्दोलन ने नयी राजनीतिक हलचल पैदा की

गोरखपुर श्रमिक अधिकार समर्थक समिति की ओर से ‘श्रमिक अधिकार और नागरिक समाज का दायित्व’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि बरगदवां के मजदूर आन्दोलन ने गोरखपुर में काफी समय से व्याप्त अराजनीतिक माहौल को तोड़कर एक नयी राजनीतिक हलचल पैदा की है। वक्ताओं का मानना था कि इस आन्दोलन ने मज़दूरों के मुद्दों को पुरज़ोर ढंग से समाज के सामने रखने का बड़ा काम किया है। अधिकांश वक्ताओं का कहना था कि मुख्यधारा के मीडिया और मध्यवर्गीय शिक्षित आबादी की नज़रों से मज़दूरों के हालात और उनकी समस्याएँ प्रायः छिपी ही रहती हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों के दौरान इस आन्दोलन ने लोगों को इन सवालों पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। गोष्ठी में शहर के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, ट्रेडयूनियन कर्मियों, वामपन्थी संगठनों और नागरिक अधिकार संगठनों के प्रतिनिधियों ने भागीदारी की। वक्ताओं ने एक स्वर से शासन और प्रशासन से श्रम क़ानून लागू कराने की माँग की तथा मजदूर आन्दोलन के खिलाफ उद्योगपतियों की ओर से किये जा रहे दुष्प्रचार की कड़ी निन्दा की।
गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए पीयूसीएल गोरखपुर के संयोजक फतेहबहादुर सिंह ने कहा कि इस आन्दोलन से पैदा हुई राजनीतिक हलचल को आगे बढ़ाना होगा। गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डा. अनन्त मिश्र ने कहा कि मज़दूरों के उत्पीड़न के विरुद्ध समाज के जागरूक नागरिकों को एकजुट होना होगा। राजनीति शास्त्र विभाग के डा. रजनीकान्त पाण्डेय ने कहा कि आज सत्ता खुलकर मज़दूरों और आम आदमी के खिलाफ खड़ी है। इसके विरुद्ध पूरे समाज को खड़ा होना होगा। उन्होंने कहा कि गोरखपुर की जनता का बहुमत मज़दूर आन्दोलन के साथ है।
विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के डा. अनिल राय ने मज़दूर आन्दोलनों के सम्बन्ध में मीडिया की भूमिका पर सवाल खड़े किये। डा. जर्नादन ने मज़दूरों को उनका हक दिलाने के लिए नागरिक समाज के लोगों से आगे आने की अपील की। डा. असीम सत्यदेव ने कहा कि जब मज़दूर अधिकार सुरक्षित रहेंगे तभी नागरिक अधिकारों की भी रक्षा हो सकेगी।
मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन के सचिव राकेश श्रीवास्तव ने कहा कि श्रम क़ानूनों को लागू कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है। रेल मज़दूरों के नेता मुक्तेश्वर राय और राम सिंह ने बरगदवां के मज़दूर आन्दोलन के प्रति एकजुटता ज़ाहिर करते हुए कहा कि श्रम कानूनों को लागू कराने के लिए मिलकर लड़ना होगा। मानवाधिकार कार्यकर्ता मनोज कुमार सिंह ने श्रमिक अधिकारों पर हो रहे हमले को मानवाधिकारों पर हमला बताया। चतुरानन ओझा ने कहा कि जन प्रतिनिधियों का श्रमिक अधिकारों के खिलाफ खड़ा होना गम्भीर मामला है। कथाकार मदनमोहन, चक्रपाणि, भाकपा के ओमप्रकाश चन्द, माकपा के जावेद, भाकपा (माले) के हरिद्वार प्रसाद, अयोध्या साहनी आदि ने भी अपने विचार रखे। विषय प्रवर्तन डा. रामू दुबे ने किया और संचालन श्रमिक अधिकार समर्थक समिति के संयोजक यशवन्त सिंह ने किया।

1 कमेंट:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi November 2, 2009 at 11:42 PM  

श्रमजीवियों की व्यापक एकता ही संघर्ष के लिए उत्तम औजार है। आप ने उस का सदुपयोग किया है।

बिगुल के बारे में

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