26.5.11
29.5.10
लुधियाना के मजदूर आन्दोलन में माकपा-सीटू के मजदूर विरोधी कारनामे
4.1.10
बादाम मज़दूरों की 15 दिन लम्बी ऐतिहासिक हड़ताल समाप्त
31 दिसम्बर, नई दिल्ली। पिछले 15 दिनों से जारी दिल्ली के बादाम मज़दूरों की ऐतिहासिक हड़ताल आज शाम मालिक पक्ष से हुई वार्ता के बाद समाप्त हो गई। ज्ञात हो कि यह हड़ताल 16 दिसम्बर से शुरू हुई थी और इसमें करीब 20 हज़ार मज़दूर परिवार शिरकत कर रहे थे। इसे दिल्ली के असंगठित मज़दूरों की अब तक की सबसे बड़ी और सबसे बड़ी हड़ताल कहा जा रहा था। इस वार्ता के पहले भी एक वार्ता मालिक पक्ष और मज़दूर यूनियन के बीच हुई थी, लेकिन उसमें दोनों पक्ष किसी भी नतीजे पर पहुँच पाने में सफल नहीं हुए थे। उसके बाद हड़ताल जारी रही और आज अंततः दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ।
बादाम मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में पिछले 15 दिनों से जारी इस हड़ताल में मज़दूरों ने एक 5-सूत्रीय माँगपत्रक बादाम ठेकेदारों के सामने रखा था। इनमें मुख्य तौर पर श्रम कानूनों द्वारा प्रदत्त अधिकार शामिल थे। पहले बादाम मज़दूरों को एक बोरी बादाम संसाधित करने के लिए मात्र रुपये 50 मिलते थे। इसके अतिरिक्त, उन्हें कई-कई महीने की मज़दूरी का भुगतान नहीं किया जाता था। इसके अतिरिक्त, मज़दूरों के साथ गोदामों के भीतर उनके साथ गाली-गलौच और बदसलूकी आम थी। साथ ही, बादाम से निकलने वाले छिलके को ये ठेकेदार मज़दूरों को मनमानी कीमत पर बेचते थे, जिसे ये मज़दूर खाना पकाने के लिए ईंधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। यूनियन के नेतृत्व में मज़दूर माँग कर रहे थे कि मज़दूरों को एक बोरी बादाम के संसाधन पर कम-से-कम 70 रुपये मिलने चाहिए और साथ ही छिलका का एक बोरा उन्हें 20 रुपये में मिलना चाहिए। साथ ही, वे माँग कर रहे थे कि उनकी मज़दूरी का भुगतान महीने के पहले सप्ताह में हो जाना चाहिए।
मालिक पक्ष पिछले 15 दिनों से मज़दूरी न बढ़ाने पर अड़ा हुआ था और कह रहा था कि पहले मज़दूर हड़ताल तोड़कर काम पर आएँ और वे 16 जनवरी के बाद मज़दूरी बढ़ाने के बारे में सोचेंगे। लेकिन मज़दूर इस पर राज़ी नहीं थे। हड़ताल के दौरान एक मालिक की महिला मज़दूरों द्वारा पिटाई, पुलिस प्रशासन द्वारा हड़ताल को डरा-धमकाकर तोड़ने के असफल प्रयासों, दलालों और बिचैलियों द्वारा हड़ताल को तोड़ने की नाकाम कोशिशों के बाद मालिक के तरकश के तीर समाप्त हो चुके थे। 29 दिसम्बर के बाद यह स्पष्ट था कि यह अब वक्त की बात है कि मालिक पक्ष कब समझौता करता है। 31 दिसम्बर की सुबह ही कुछ मालिकों ने माँगों को यूनियन से वार्ता के बगैर मान लिया और काम शुरू करा दिया। इसके कारण मालिकों के पक्ष में फूट पड़ गई। अंततः शाम 6 बजे के करीब मालिकों के प्रतिनिधियों और मज़दूरों के प्रतिनिधियों के बीच वार्ता हुई और इस बात पर समझौता हुआ कि मालिक मज़दूरों को एक बोरी बादाम के संसाधन पर 60 रुपये देंगे, बादाम के छिलके को 20 रुपये में बेचेंगे और साथ ही मज़दूरों को मज़दूरी का भुगतान हर माह के पहले सप्ताह में कर देंगे।
इस समझौते के साथ मज़दूरों ने अपनी हड़ताल समाप्त की और 1 जनवरी से वे काम पर लौटेंगे। इस हड़ताल के समापन के साथ दिल्ली के असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों की अब तक की विशालतम हड़ताल का समापन हुआ। बादाम मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में हज़ारों असंगठित मज़दूरों ने सिद्ध किया कि वे लड़ सकते हैं और जीत सकते हैं। जाहिर है कि मज़दूर अपनी सभी माँगों को नहीं जीत सके। लेकिन इस हड़ताल का महत्व महज़ इतना नहीं रह गया था कि मज़दूरी कितनी बढ़ती है और कितनी नहीं। एक ऐसे उद्योग में जहाँ मज़दूरों को मालिक और ठेकेदार गुलामों की तरह खटाते थे, उनकी साथ लगातार बदसलूकी की जाती थी और उन्हें इंसान तक नहीं समझा जाता था, वहाँ मज़दूरों ने एक ऐतिहासिक और जुझारू लड़ाई लड़कर इज्जत का अपना हक हासिल किया। मालिकों को पहली बार मज़दूरों की ताक़त का अहसास हुआ और उनकी यह गलतफहमी दूर हो गयी कि मज़दूर उनकी ज़्यादतियों को चुपचाप बर्दाश्त करते रहेंगे और कभी कुछ नहीं बोलेंगे। हड़ताल के अंत के दौर तक मालिक मज़दूरों के सामने हर तरह से झुकने लगे थे। इसके अतिरिक्त, न सिर्फ मालिकों को मज़ूदरों की ताक़त का अन्दाज़ा चला, बल्कि पूरे इलाके में संगठित मज़दूरों की ताक़त एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी।
इस हड़ताल की एक और उपलब्धि यह रही कि सी.पी.आई. (एम.एल.) आदि जैसी चुनावी पार्टियों की ट्रेड यूनियनों को मज़दूरों ने किनारे कर दिया और बादाम मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में बिना किसी चुनावी पार्टी के सहयोग या समर्थन के अपनी लड़ाई को मुकाम तक पहुँचाया। तमाम ट्रेड यूनियनों के दल्लालों को मज़दूरों ने सिरे से नकार दिया। इस पूरी लड़ाई में चुनावी पार्टियों, आर.एस.एस., पुलिस प्रशासन समेत सभी प्रमुख ताक़तों के असली चेहरे को मज़दूरों ने पहचाना और यह समझा कि उन्हें अपनी लड़ाई को अपने बूते लड़ना है।
बादाम मज़दूर यूनियन के संयोजक आशीष कुमार ने कहा कि यह लड़ाई अन्त नहीं बल्कि एक शुरुआत है। आगे भी बादाम मज़दूर अपनी यूनियन के झण्डे तले अपने ऐेसे तमाम अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहेंगे जो अभी भी उनकी पहुँच से दूर हैं। आशीष ने कहा कि जब तक यह पूरा उद्योग अनौपचारिक और अवैध रूप से काम करता रहेगा और किसी कानून के दायरे में नहीं आएगा तब तक मज़दूरों की कानूनी लड़ाई का पहलू कमज़ोर रहेगा। यूनियन का अगला लक्ष्य है कि इस पूरे उद्योग को औपचारिक ढाँचा देने के लिए सरकार के श्रम विभाग से मिला जाय।
बिगुल मज़दूर अखबार के संवाददाता और दिल्ली के श्रमिकों पर शोध कर रहे अभिनव ने कहा कि यह संघर्ष आने वाले कई दशकों तक दिल्ली के मज़दूरों के जेहन में ताज़ा रहेगा। यह अपने किस्म का पहला संघर्ष था और इस संघर्ष ने इस मिथक को ध्वस्त कर दिया कि असंगठित मज़दूर संगठित होकर लड़ नहीं सकते। इलाकाई पैमाने पर मज़दूरों के संगठन खड़े करके असंगठित और बिखरे हुए मज़दूरों की लड़ाई को भी एक संगठित और विशाल रूप दिया जा सकता है। निश्चित रूप से इसकी अपनी चुनौतियाँ और मुश्किलें हैं लेकिन इस हड़ताल ने साबित किया है कि इन मुश्किलों को हल किया जा सकता है। Read more...
21.12.09
2000 मज़दूरों ने विशाल चेतावनी रैली निकाली
19.12.09
बादाम मज़दूरों के नेता रिहा
17 दिसम्बर को पुलिस ने बिना कोई चिकित्सीय सहायता प्रदान किये मज़दूर नेताओं को घायल हालत में ही गोकलपुरी थाने में लाॅक-अप में बन्द कर दिया। ज्ञात हो, कि यह मामला करावलनगर थाने के अन्तर्गत आता है लेकिन मज़दूरों से भयाक्रान्त पुलिस प्रशासन ने इन मज़दूर नेताओं को करावलनगर या खजूरी थाने में नहीं बन्द किया। जाहिर है कि पुलिस पूरी तरह मालिकों की ओर से कार्रवाई कर रही है। मालिकों को किराए के गुण्डे रखने की कोई ज़रूरत नहीं थी।
इस बीच करावलनगर इलाके में चौथे दिन भी हज़ारों की संख्या में मज़दूर हड़ताल स्थल पर मौजूद रहे। हड़ताल के जारी रहने से करावलनगर का पूरा बादाम संसाधन उद्योग ठप्प पड़ गया है। बादाम मज़दूर यूनियन के नवीन ने कहा कि करावलनगर पुलिस थाने के पक्षपातपूर्ण व्यवहार और मज़दूरों की ओर से प्राथमिकी दर्ज़ न कराए जाने के कारण यूनियन सीधे पुलिस उपायुक्त, उत्तर-पूर्वी दिल्ली के पास शिकायत दर्ज़ कराएगी और अगर तब भी कार्रवाई नहीं होती है तो फिर हमारे पास अदालत जाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा। ग़ौरतलब है कि बादाम मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में पिछले एक वर्ष से बादाम मज़दूर अपने कानूनी हक़ों की माँग कर रहे हैं और साथ ही बादाम संसाधन उद्योग को सरकार द्वारा औपचारिक दर्ज़ा दिये जाने की माँग कर रहे हैं। फिलहाल, सभी बादाम गोदाम मालिक गैर-कानूनी ढंग से बिना किसी सरकारी लाईसेंस या मान्यता के ठेके पर मज़दूरों से अपने गोदामों में काम करवा रहे हैं। इसमें बड़े पैमाने पर महिला मज़दूर हैं लेकिन उनके लिए शौचालय या शिशु घर जैसी कोई सुविधा नहीं है। बादाम मज़दूरों को तेज़ाब में डाल कर सुखाए गए बादामों को हाथों, पैरों और दांतों से तोड़ना पड़ता है। उनके लिए सुरक्षा के कोई इंतज़ाम नहीं हैं और उन्हें टी.बी., खांसी, आदि जैसे रोग आम तौर पर होते रहते हैं। महिला मज़दूरों के बच्चे भी काफ़ी कम उम्र में ही जानलेवा बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। बादाम मज़दूर यूनियन इन मज़दूरों के लिए बेहतर कार्य स्थितियों की भी माँग कर रही है। लेकिन मालिक और ठेकेदार पुलिस प्रशासन और स्थानीय नेताओं और गुण्डों के बल पर अपनी मनमानी और गुण्डागर्दी चला रहे है। बादाम मज़दूर यूनियन के योगेश ने कहा कि लेकिन अब वे दिन लद गये हैं जब मज़दूर गुलामों की तरह चुपचाप खटते रहते थे और कोई आवाज़ नहीं उठाते थे। वे एक यूनियन के रूप में संगठित हो चुके हैं और अपने कानूनी हक़ों को जीतने से नीचे वे किसी जीत पर नहीं रुकेंगे।
बादाम मज़दूर यूनियन के आज रिहा हुए संयोजक आशीष कुमार सिंह ने कहा कि बादाम के ठेकेदार बुरी तरह से डर गये हैं। पुलिस को अपने साथ मिलाकर और गुण्डों के बल पर निहत्थे मज़दूरों पर कायराना हमला कराकर उन्होंने साबित कर दिया है कि वे झुण्ड में निहत्थे महिलाओं और बच्चों पर ही अपने पौरुष का प्रदर्शन कर सकते हैं। लेकिन महिला मज़दूरों ने उनके हमले का मुँहतोड़ जवाब देकर साबित कर दिया है कि वे ऐसे किसी भी नापाक हमले का जवाब उसी भाषा में दे सकते हैं। अब वे दिन गये जब मज़दूर चुपचाप मालिकों की मार और गाली-गलौच को बर्दाश्त करते थे। मज़दूर अपनी एकता के बल पर बिकी हुई पुलिस और मालिकों के गुण्डों, दोनों से टकराने की ताक़त रखते हैं। इस कायराना हमले ने मज़दूरों के हौसले को तोड़ने की बजाय उन्हें और बुलन्द कर दिया है। यह अकारण नहीं है कि करीब 15 फीसदी मज़दूर जो भय के कारण हड़ताल में शामिल नहीं थे, मज़दूर नेताओं की गिरफ्तारी के बाद वे भी हड़ताल में शामिल हो चुके हैं और उन्होंने मालिकों की मुनाफे की मशीनरी का चक्का पूरी तरह जाम कर दिया है।
17.12.09
बादाम तोड़ने वाले 25-25 हज़ार मज़दूर हड़ताल पर
नई दिल्ली के करावल नगर इलाके में बादाम तोड़ने वाले मज़दूरों ने हड़ताल की घोषणा कर दी है। 'बादाम मज़दूर यूनियन' के बैनर तले इन मज़दूरों के हड़ताल पर जाने से अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया सहित कई यूरोपीय देशों में बादाम निर्यात प्रभावित हो गया है। बादाम मज़दूर यूनियन के संयोजक आशीष ने कहा कि सरकार ने 1970 में ठेका मज़दूरी क़ानून के तहत जो बुनियादी अधिकार दिए थे उनका यहां कोई पालन नहीं हो रहा है। श्रम क़ानूनों के उल्लंघन से यहां के 20 हज़ार से ज़्यादा मज़दूर त्रस्त हैं। यूनियन के सदस्य राहुल ने कहा कि बेहिसाब महंगाई में न्यूनतम मज़दूरी भी न मिलने से मज़दूरों के परिवारों के सामने दाल-रोटी की चिंता बढ़ गयी है। लिहाज़ा मज़दूरों ने काम बंद कर दिया है।
बादाम मज़दूर यूनियन के संयोजकों पर हमला, पुलिस ने गुण्डो की जगह संयोजकों को ही गिरफ्तार किया
करावल नगर के बादाम मज़दूर कल से मज़दूरी बढ़ाने की मांग को लेकर हड़तालत पर हैं। आज सुबह क़रीब 1500 महिला-पुरुष मज़दूर अपनी मांग के समर्थन में यूनियन के संयोजक आशीष तथा अन्य लोगों की अगुवाई में इलाकाई पैमाने का जुलूस निकाल रहे थे। ये मज़दूर प्रति बोरा 40 रुपये की बेहद मामूली दरों पर ठेकेदारों के लिए काम करते हैं। आन्दोलन के बढ़ते जनसमर्थन से बौखलाए बादाम ठेकेदारों ने सुबह क़रीब 11:30 बजे अपने गुण्डो से जुलूस पर हमला करा दिया। हमले में आशीष, कुणाल और प्रेमप्रकाश बुरी तरह घायल हो गये। ठेकेदारों की बर्बरता से बौखलाए मज़दूरों ने इस पर ज़बर्दस्त प्रतिरोध किया।
17.10.09
मज़दूर संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों के नाम अपील
मामूली धाराओं में भी 22 अक्टूबर तक ज़मानत देने से इंकार, हिरासत में पिटाई
''नक्सली'', ''आतंकवादी'' होने का आरोप लगाकर लंबे समय तक बंद रखने की तैयारी
मालिकों की शह पर पुलिसिया आतंकराज
पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में करीब ढाई महीने से चल रहे मज़दूर आन्दोलन को कुचलने के लिए प्रशासन ने फैक्ट्री मालिकों के इशारे पर एकदम नंगा आतंकराज कायम कर दिया है। गिरफ्तारियां, फर्जी मुकदमे, मीडिया के जरिए दुष्प्रचार व धमकियों के जरिए मालिक-प्रशासन-नेताशाही का गंठजोड़ किसी भी कीमत पर इस न्यायपूर्ण आंदोलन को कुचलने पर आमादा है।
15 अक्टूबर की रात संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा के तीन नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं - प्रशांत, प्रमोद कुमार और तपीश मैंदोला को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस उन पर शांति भंग जैसी मामूली धाराएं ही लगा पाई लेकिन फिर भी 16 अक्टूबर को सिटी मजिस्ट्रेट ने उन्हें ज़मानत देने से इंकार करके 22 अक्टूबर तक जेल भेज दिया। इससे पहले 15 अक्टूबर की रात ज़िला प्रशासन ने तीनों नेताओं को बातचीत के लिए एडीएम सिटी के कार्यालय में बुलाया जहां काफी देर तक उन्हें जबरन बैठाये रखा गया और उनके मोबाइल फोन बंद कर दिये गये। उन्हें आन्दोलन से अलग हो जाने के लिए धमकियां दी गईं। इसके बाद उन्हें कैंट थाने ले जाया गया जहां उनके साथ मारपीट की गई। इसके अगले दिन मालिकों की ओर से इन तीन नेताओं के अलावा 9 मजदूरों पर जबरन मिल बंद कराने, धमकियां देने जैसे आरोपों में एकदम झूठा मुकदमा दर्ज कर लिया गया।
गिरफ्तारी वाले दिन से ही जिला प्रशासन के अफसर ऐसे बयान दे रहे हैं कि इन मजदूर नेताओं को ''माओवादी'' होने की आशंका में गिरफ्तार किया गया है और उनके पास से ''आपत्तिाजनक'' साहित्य आदि बरामद किया गया है। उल्लेखनीय है कि गोरखपुर के सांसद की अगुवाई में स्थानीय उद्योगपतियों और प्रशासन की ओर से शुरू से ही आन्दोलन को बदनाम करने के लिए इन नेताओं पर ''नक्सली'' और ''बाहरी'' होने का आरोप लगाया जा रहा है। कुछ अफसरों ने स्थानीय पत्रकारों को बताया है कि पुलिस इन नेताओं को लंबे समय तक अंदर रखने के लिए मामला तैयार कर रही है।
इससे पहले 15 अक्टूबर को जिलाधिकारी कार्यालय में अनशन और धरने पर बैठे मजदूरों पर हमला बोलकर उन्हें वहां से हटा दिया गया। महिला मजदूरों को घसीट-घसीटकर वहां से हटाया गया। प्रशांत, प्रमोद एवं तपीश को ले जाने का विरोध कर रही महिलाओं के साथ मारपीट की गई।
ये मजदूर स्वयं प्रशासन द्वारा पिछले 24 सितम्बर को कराये गये समझौते को लागू कराने की मांग पिछले कई दिनों से प्रशासन से कर रहे थे। 3 अगस्त से जारी आन्दोलन के पक्ष में जबर्दस्त जनदबाव के चलते प्रशासन ने समझौता कराया था लेकिन मिलमालिकों ने उसे लागू ही नहीं किया। समझौते के बाद दो सप्ताह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद आधे से अधिक मजदूरों को काम पर नहीं लिया गया है। थकहारकर 14 अक्टूबर से जब वे डीएम कार्यालय पर अनशन पर बैठे तो प्रशासन पूरी ताकत से उन पर टूट पड़ा।
मॉडर्न लेमिनेटर्स लि. और मॉडर्न पैकेजिंग लि. के इन मजदूरों की मांगें बेहद मामूली हैं। वे न्यूनतम मजदूरी, जॉब कार्ड, ईएसआई कार्ड देने जैसे बेहद बुनियादी हक मांग रहे हैं, श्रम कानूनों के महज़ कुछ हिस्सों को लागू करने की मांग कर रहे हैं। बिना किसी सुविधा के 12-12 घंटे, बेहद कम मजदूरी पर, अत्यंत असुरक्षित और असहनीय परिस्थितियों में ये मजदूर आधुनिक गुलामों की तरह से काम करते रहे हैं। गोरखपुर के सभी कारखानों में ऐसे ही हालात हैं। किसी कारखाने में यूनियन नहीं है, संगठित होने की किसी भी कोशिश को फौरन कुचल दिया जाता है। पहली बार करीब पांच महीने पहले तीन कारखानों के मजूदरों ने संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा बनाकर न्यूनतम मजदूरी देने और काम के घंटे कम करने की लड़ाई लड़ी और आंशिक कामयाबी पायी। इससे बरसों से नारकीय हालात में खट रहे हजारों अन्य मजदूरों को भी हौसला मिला। इसीलिए यह मजदूर आन्दोलन इन दो कारखानों के ही नहीं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के तमाम उद्योगपतियों को बुरी तरह खटक रहा है और वे हर कीमत पर इसे कुचलकर मजदूरों को ''सबक सिखा देना'' चाहते हैं। कारखाना मालिक पवन बथवाल दबंग कांग्रेसी नेता है और भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ का उसे खुला समर्थन प्राप्त है। प्रशासन और श्रम विभाग के अफसर बिके हुए हैं। शहर में आम चर्चा है कि मालिकों ने अफसरों को खरीदने के लिए दोनों हाथों से पैसा लुटाया है।
मजदूरों ने पिछले दो महीनों के दौरान गोरखपुर से लेकर लखनऊ तक, हर स्तर पर बार-बार अपनी बात पहुंचायी है लेकिन ''सर्वजन हिताय'' की बात करने वाली सरकार कान में तेल डालकर सो रही है।
मजदूरों और नेतृत्व के लोगों को डराने-धमकाने, फोड़ने की हर कोशिश नाकाम हो जाने के बाद पिछले महीने से यह सुनियोजित मुहिम छेड़ दी गई कि इस आन्दोलन को ''माओवादी आंतकवादी'' और ''बाहरी तत्व'' चला रहे हैं और यह ''पूर्वी उत्तर प्रदेश को अस्थिर करने की साज़िश'' है। इससे बड़ा झूठ कोई नहीं हो सकता। संघर्ष मोर्चा में सक्रिय ये तीनों ही कार्यकर्ता जनसंगठनों से लंबे समय से जुड़कर काम करते रहे हैं। प्रशांत और प्रमोद विगत कई वर्षों से गोरखपुर के छात्रों और नौजवानों के बीच सामाजिक काम करते रहे हैं। पिछले वर्ष 'गीडा' के एक कारखाने के मज़दूरों तथा नगर महापालिका और विश्वविद्यालय के सफाई कर्मचारियों के आन्दोलनों में भी उनकी सक्रियता थी। शहर के अधिकांश प्रबुद्ध नागरिक और मज़दूर उन्हें जानते हैं। तपीश मैंदोला मज़दूर अखबार 'बिगुल' से जुड़े हैं और श्रम मामलों के विशेषज्ञ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। कई वर्षों से वे नोएडा, गाज़ियाबाद के सफाई मज़दूरों और फैक्ट्री मज़दूरों के बीच काम करते रहे हैं। इन दिनों उनके नेतृत्व में मऊ, मैनपुरी और इलाहाबाद में नरेगा के मज़दूर अपनी माँगों को लेकर संगठित हो रहे हैं। तपीश के नेतृत्व में दिल्ली और आसपास से मज़दूरों के खोये हुए बच्चों के बारे में प्रस्तुत बहुचर्चित रिपोर्ट पर इन दिनों दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। ये तीनों साथी जन-आधारित राजनीति के पक्षधर हैं और आतंकवाद की राजनीति के विरोधी हैं।
किसी भी जनान्दोलन को ''माओवाद'' का ठप्पा लगाकर कुचलने के नये सरकारी हथकंडे का यह एक नंगा उदाहरण है। इसका पुरज़ोर विरोध किया जाना बेहद ज़रूरी है। यह तमाम इंसाफ़पसंद नागरिकों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, छात्र-युवा कार्यकर्ताओं को सत्ता की सीधी चुनौती है! हमारी आपसे अपील है कि हर संभव तरीके से अपना विरोध दर्ज कराए।
आप क्या कर सकते हैं :
- मज़दूर आन्दोलन के दमन और मजदूर नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री, प्रमुख सचिव, श्रम और श्रम मंत्री को, तथा गोरखपुर के जिलाधिकारी को फैक्स, ईमेल या स्पीडपोस्ट से विरोधपत्र भेजें। ईमेल की एक प्रति कृपया हमें भी फारवर्ड कर दें।
- इस मुद्दे पर बैठकें तथा धरना-विरोध प्रदर्शन आयोजित करें।
- अपने संगठनों की ओर से अपनी ओर से इसके विरोध में बयान जारी करें और हस्ताक्षर अभियान चलाकर उपरोक्त पतों पर भेजें।
- दिल्ली में 21 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश भवन पर आयोजित विरोध प्रदर्शन में शामिल हों।
गोरखपुर के मजदूर आन्दोलन के समर्थक बुद्धिजीवियों, आम नागरिकों, छात्रों-युवाओं की ओर से,
कात्यायनी, सत्यम, मीनाक्षी, रामबाबू, कमला पाण्डेय, संदीप, संजीव माथुर, जयपुष्प, कपिल स्वामी, अभिनव, सुखविन्दर, डा. दूधनाथ, शिवार्थ पाण्डेय, अजय स्वामी, शिवानी कौल, लता, श्वेता, नेहा, लखविन्दर, राजविन्दर, आशीष, योगेश स्वामी, नमिता, विमला सक्करवाल, चारुचन्द्र पाठक, रूपेश राय, जनार्दन, समीक्षा, राजेन्द्र पासवान...
पतों एवं फोन-फैक्स नंबरों की सूची
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District Magistrate
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Fax: 0522-2223892
Special Secretary to Governor: 0522-2236113
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Km. Mayawati
Fifth Floor, Secretariat Annexe
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Department of Labour
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Fax: 0522 - 2238925
Principal Secretary, Labour
Department of Labour
Secretariat, Lucknow - 226001

