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26.5.11

12 मज़दूर नेता ज़मानत पर रिहा, आन्दोलन और तेज करने का ऐलान

प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखकर प्रशासन के पक्षपात और दमन-उत्पीड़न की जानकारी दी

नई दिल्‍ली, 26 मई। गोरखपुर में पिछले 20 मई को गिरफ्तार किए गए 12 मज़दूर नेता आज ज़मानत पर रिहा कर दिए गए। रिहा होने के बाद संयुक्त मज़दूर अधिकार संघर्ष मोर्चा के तपीश मैन्दोला ने कहा कि मज़दूरों की मांगों को लेकर आन्दोलन अब और तेज किया जाएगा।
     उन्होंने कहा कि मालिकान की शह पर प्रशासन डरा-धमकाकर और लाठी-गोली-जेल के सहारे मज़दूर आन्दोलन को कुचलने की कोशिश कर रहा है लेकिन वह कामयाब नहीं होगा। मज़दूर अपने मूलभूत अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं और वे अब पीछे नहीं हटेंगे। तपीश ने कहा कि वी.एन. डायर्स में जबरन तालाबन्दी करके और अंकुर उद्योग में मज़दूरों पर गोलियां चलवाकर मालिकों ने यह लड़ाई मज़दूरों पर थोपी है। मगर प्रशासन मालिकों के सुर में सुर मिलाकर उल्टा हमें ही अराजक और विकास-विरोधी बता रहा है।
     इस बीच संयुक्त मज़दूर अधिकार संघर्ष मोर्चा की ओर से प्रशान्त ने आज प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति और मानवाधिकार आयोग को पत्र भेजकर मज़दूरों के दमन-उत्पीड़न और गोरखपुर ज़िला प्रशासन तथा पुलिस के पक्षपातपूर्ण रवैये की जानकारी दी। पत्र में लिखा गया है कि मज़दूरों को शान्तिपूर्ण ढंग से धरना-प्रदर्शन तक नहीं करने दिया जा रहा है और किसी अधिकारी तक से मिलने नहीं दिया जा रहा है। चिलुआताल के थानाध्यक्ष गजेन्द्र राय बरगदवा में घर-घर जाकर मज़दूरों को धमका रहे हैं और कारखाने में काम पर जाने के लिए ज़ोर-ज़बर्दस्ती कर रहे हैं।
      मज़दूर आन्दोलन का समर्थन करने के कारण गिरफ्तार की गयी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता श्वेता ने भी पत्र भेजकर राष्ट्रीय महिला आयोग से पुलिस द्वारा की गयी बदसलूकी और डराने-धमकाने की शिकायत की है। पांच दिन बाद जेल से रिहा हुई श्वेता ने कहा कि चिलुआताल के थानाध्यक्ष गजेन्द्र राय ने उन्हें ''देख लेने'' और कैरियर बर्बाद कर देने की धमकी दी। गिरफ्तार करने के बाद उन्हें तथा एक मज़दूर की बुजुर्ग मां सुशीला देवी को महिला थाने में भी डराया-धमकाया गया।
ज्ञातव्य है कि गत 20 मई को जब पांच अनशनकारियों के साथ मज़दूर ज़िलाधिाकारी से मिलने जा रहे थे तो पुलिस ने उन पर कई बार लाठीचार्ज किया था जिसमें 25 मज़दूरों को चोटें लगी थीं। पुलिस ने 73 मज़दूरों को हिरासत में लिया था जिनमें से 59 मज़दूरों को देर रात छोड़ दिया गया था लेकिन तपीश मैन्दोला और दो महिला कार्यकर्ताओं श्वेता तथा सुशीला देवी सहित 14 मज़दूर नेताओं को जेल भेज दिया गया था। उन पर विभिन्न जमानती एवं गैर-जमनाती धाराओं में तीन-तीन मुकदमे कायम किए गए थे।
 
इस बीच संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा ने आज राज्य के प्रमुख सचिव, श्रम को दिए गए ज्ञापन में कहा है कि गोरखपुर में तमाम कारखानों में श्रम कानूनों का उल्लंघन हो रहा है और श्रम विभाग के अधिकारी खुलेआम पक्षपात कर रहे हैं जिसके कारण यहां निरन्तर श्रमिक अशान्ति बनी हुई है। इसलिए शासन के स्तर से उच्च स्तरीय जांच टीम भेजकर यहां सभी कारखानों की तथा स्थानीय श्रम कार्यालय की भूमिका की जांच करायी जाए। गत 19 मई को मज़दूरों को बाहर रखकर पक्षपातपूर्ण ढंग से केवल वी.एन. डायर्स के मालिकों के साथ एकतरफा वार्ता आयोजित कर निर्णय करने वाले श्रम विभाग के अधिकारियों पर कार्रवाई की जाये।
इस बीच गोरखपुर के दोनों औद्योगिक क्षेत्रों, कार्यालयों और शहर के प्रमुख स्थानों पर नुक्कड़ सभाओं तथा रिहायशी इलाकों में जनसम्पर्क के जरिए उद्योगपतियों तथा प्रशासन की मिलीभगत का भंडाफोड़ करने और मजदूरों की मांगों के पक्ष में जनसमर्थन जुटाने का अभियान जारी है।
देश के विभिन्न भागों से गोरखपुर में मजदूर आन्दोलन की निन्दा और मायावती सरकार पर दबाव बनाने का अभियान भी लगातार जारी है। आज मुंबई में गरीबों को उजाड़ने के खिलाफ मेधा पाटकर के नेतृत्व में चल रही भूख हड़ताल और प्रदर्शन के दौरान भी गोरखपुर के मजदूरों के दमन का सवाल उठाया गया और संघर्षरत मजदूरों के साथ एकजुटता जाहिर की गयी। बंगलूर से सामाजिक कार्यकर्ता कावेरी इन्दिरा के नेतृत्व में विभिन्न सामाजिक कर्मियों ने मुख्यमंत्री तथा अन्य अधिकारियों को फोन तथा फैक्स द्वारा अपना विरोध दर्ज कराया। कल कोलकाता में विभिन्न संगठन प्रदर्शन कर राज्यपाल के माध्यम से मुख्यमंत्री मायावती के नाम ज्ञापन भेजकर उत्तर प्रदेश में मज़दूरों के बढ़ते दमन पर विरोध जताएंगे।
 
कृपया इस ऑनलाइन याचिका पर हस्‍ताक्षर करके मजदूरों के दमन का विरोध करें : http://bit.ly/kvIuIq  

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29.5.10

लुधियाना के मजदूर आन्दोलन में माकपा-सीटू के मजदूर विरोधी कारनामे

संघर्षशील मजदूर साथियों को समझौतापरस्त, भ्रष्ट और दलाल नेतृत्व से पीछा छुड़ाकर मजदूर आन्दोलन में आये गतिरोध को तोड़ना होगा


भारत के मजदूर आन्दोलन पर जरा सी भी ईमानदार नजर रखने वाले लोगों के लिए आज यह बात दिन के उजाले की तरह साफ है कि सी.पी.आई.एम. (माकपा) और उसका मजदूर विंग सी.आई.टी.यू. (सीटू) किस कदर खुलकर पूँजीपतियों की सेवा में लगे हुए हैं। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है, बस पिछले 8-10 वर्षों की इनकी कारगुजारियों पर नजर डाल ली जाये तो कोई शक नहीं रह जाता कि माकपा-सीटू के झण्डे का लाल रंग नकली है और ये मजदूरों की पीठ में छुरा घोंपने का ही काम कर रहे हैं। देश में जहाँ-जहाँ भी इनका जोर चला, इन्होंने बड़ी चालाकी के साथ मजदूर आन्दोलन का बेड़ा गर्क करने में किसी तरह की कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी।

लुधियाना के मजदूर आन्दोलन में माकपा-सीटू ने जो समझौतापरस्त, दलाल, भ्रष्ट, पूँजीपतिपरस्त और घोर मजदूर विरोधी भूमिका अदा की है, उसकी चर्चा से पहले हम लुधियाना के मजदूर आन्दोलन के आगे बढ़ने की जबरदस्त सम्भावनाओं के बारे में कुछ बातें करेंगे।

लुधियाना देश के बड़े ओद्योगिक शहरों में से एक है। पिछले कुछ वर्षों में यहाँ के मजदूर अपने बुनियादी हकों के लिए लड़ते रहे हैं। लुधियाना के बड़े कारखानों जैसे हीरो साइकिल, रॉकमैन, एवन, रॉलसन, हाईवे, गरेटवे, बजाज संस के हजारों-हजार मजदूरों का संघर्ष; 2008 में हिन्दुस्तान टायर्ज काण्ड के बाद लुधियाना के दसियों हजार मजदूरों द्वारा कारखाना मालिकों, पुलिस-प्रशासन के खिलाफ जुझारू संघर्ष; दिसम्बर 2009 में ढण्डारी काण्ड के समय सरकार, पुलिस-प्रशासन, गुण्डा गिरोहों के खिलाफ लुधियाना की सड़कों पर फूटा दसियों हजार मजदूरों के ग़ुस्से का लावा; अभी हाल में पोद्दार टायर्ज लिमिटेड के हजारों मजदूरों द्वारा अपने एक मजदूर साथी के कारखाने से सन्दिग्धा रूप से गायब हो जाने के बाद सड़कों पर उतर आना - ये कुछेक उदाहरण ही यह समझने के लिए काफी हैं कि आज लुधियाना की मजदूर आबादी में पूँजीपतियों, उनकी सरकार, पुलिस-प्रशासन, गुण्डा गिरोहों के खिलाफ कितनी नफरत, बेचैनी और विद्रोह की भावना है। इसी के परिणामस्वरूप लुधियाना के मजदूरों का ग़ुस्सा कभी योजनाबद्ध-संगठित रूप में तो कभी स्वत:स्फूर्त-असंगठित रूप में फूटता ही रहता है। ऐसा यूँ ही नहीं है कि लुधियाना के औद्योगिक क्षेत्र में हमेशा धारा 144 लगी रहती है। यानी वहाँ कभी भी चार लोगों को इकट्ठा खड़े होने की इजाजत नहीं है। अब लुधियाना में पंजाब सरकार ने पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू कर दी है।

लेकिन लुधियाना का मजदूर आन्दोलन ख़ुद-ब-ख़ुद सही दिशा पकड़ लेगा, ऐसा सोचना गलत होगा। जोश, साहस, कुर्बानी की भावना से लबरेज और पूँजीपतियों और उनकी सरकार के खिलाफ आर-पार के संघर्ष की तमन्ना रखने वाली लुधियाना की मजदूर आबादी को अगर क्रान्तिकारी नेतृत्व नहीं हासिल होता और उसे योजनाबद्ध ढंग से संगठित नहीं किया जाता, तो लुधियाना का मजदूर आन्दोलन ऐसे ही बिना किसी तैयारी के, बिना किसी नेतृत्व के, बिना किसी योजना के स्वत:स्फूर्त संघर्षों की भूलभुलैया में चक्कर लगाता रहेगा, और कभी सही दिशा नहीं हासिल कर सकेगा या फिर अपना रूप बदल-बदलकर, झण्डे बदल-बदलकर और नारे बदल-बदलकर पूँजीवादी नेता, पार्टियाँ, संगठन व दलाल यूनियनों वाले मजदूरों को अपने संकीर्ण हितों के लिए इस्तेमाल करते रहेंगे।

लुधियाना के मजदूर आन्दोलन की इन विस्फोटक परिस्थितियों से पैदा हुए मजदूरों के संघर्षों के जुझारूपन की हवा निकालने में माकपा-सीटू वाले पूरा जोर लगाते रहे हैं। अपनी इन घिनौनी हरकतों में वे एक हद तक कामयाब भी हुए हैं। इस तरह वे नकली लाल झण्डा उठाये लुधियाना के मजदूर आन्दोलन में भितरघात का अपना काम बख़ूबी करते रहे हैं और कर रहे हैं।

पिछले समय में 2004 से लुधियाना के हीरो साइकिल, रॉकमैन, के.डब्ल्यू, एवन, रॉलसन, हाईवे, बजाज संस, मूनलाइट आदि बड़े कारखानों में चले मजदूरों के संघर्ष में माकपा-सीटू का समझौतापरस्त, दलाल, भ्रष्ट, कायर, पूँजीपतिपरस्त चरित्र बहुत खुलकर सामने आया है। उन्होंने मजदूरों के संघर्षों को भारी क्षति पहुँचायी और मजदूरों में निराशा फैलायी। हम संक्षेप में यहाँ उन तरीकों की चर्चा जरूर करेंगे जिनके जरिये इन भितरघातियों ने मजदूरों के संघर्षों की धार को कुन्द किया और कारखाना मालिकों को फायदा पहुँचाया।

जब केन्द्र में माकपा सरकार को समर्थन दे रही थी, तो कारखाना मालिकों के खिलाफ अपने संघर्षों में मजदूर यह सोचकर कि माकपा अब सत्ता में है, इसके पास अपने आन्दोलन के लिए नेतृत्व लेने गये। सभी के सभी कारखानों के आन्दोलनों में माकपा-सीटू ने मजदूरों को जुझारू संघर्ष करने से रोकने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया। सभी कारखानों के संघर्षों में मजदूरों की जुझारू पहलकदमी को दबाया गया। धरने कारखाना गेटों की बजाय गेट से दूर, माकपा-सीटू के दफ्तर या पार्कों आदि में लगते रहे। मजदूरों को अदालती केसों के जरिये मसले हल करने का भरोसा दिलाया जाता रहा। एक कारखाना के मजदूरों को दूसरे कारखाना के मजदूरों का सहयोग लेने से रोकने के लिए माकपा-सीटू वालों ने भरसक जोर लगाया। इसमें वे काफी हद तक कामयाब भी रहे।

आज जिस तरह कारखाना मालिक, सरकार, पुलिस-प्रशासन की एक चौकड़ी हो गयी है, उससे साफ कि जब तक लुधियाना के विभिन्न कारखानों के मजदूरों में आपसी तालमेल नहीं बनता, जब तक वे एकजुट होकर कारखाना मालिकों के बर्बर राज पर धावा नहीं बोलते, तब तक असल कामयाबी हासिल नहीं की जा सकती।

सीटू-माकपा के नेतृत्व में मालिकों के साथ होने वाले फैसलों में भी तरीका एकदम गैरजनवादी रहता है। सीटू-माकपा के एक-दो नेता मालिकों के साथ समझौता कर लेते रहे, जो मजदूरों पर थोप दिया जाता रहा। कभी-कभी कुछ मजदूर भी साथ ले लिये जाते, लेकिन बहुसंख्यक मजदूरों की राय लिये बिना, फैसलों में उनकी भागीदारी के बिना ही समझौते मजदूरों पर थोप दिये गये। बातचीत की जगह आदि तय करने के लिए मालिकों की पसन्द का खास धयान रखा जाता रहा। फैसले या तो मैनेजमेण्ट टेबल पर या फिर होटलों में होते रहे। एवन में हुआ समझौता तो सबसे बदनाम समझौतों के सारे रिकॉर्ड ही तोड़ गया, जब हड़ताल करके मालिक का नुकसान करने के तथाकथित जुर्म के रूप में मजदूरों से आठ दिन तक बिना वेतन के काम करवाने का समझौता माकपा-सीटू के नेताओं ने मालिकों से किया। यह फैसला मजदूरों पर जबरदस्ती थोप दिया गया।

आज भी लुधियाना हीरो साइकिल प्राइवेट लिमिटेड और बजाज संस में बनी यूनियनों की पीठ पर माकपा-सीटू के नेता सवार हैं। दोनों ही कारखानों में मजदूर अपने अधिकारों के लिए मालिकों के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए छटपटा रहे हैं। लेकिन माकपा-सीटू वाले उन्हें अपनी चालाकियों से बुरी तरह उलझाये हुए हैं और जुझारू आन्दोलन की राह में रुकावट बने हुए हैं। दोनों ही कारखानों में आज मजदूर माकपा-सीटू की समझौतापरस्त, दलाल और कायर नेतागिरी से लगभग परिचित हो चुके हैं, लेकिन वे सोचते हैं कि इनसे टूटकर आखिर जायेंगे कहाँ? वे माकपा-सीटू के नेताओं के मुँह पर भी गालियाँ देते हैं, लेकिन उनसे पीछा छुड़ाकर कहीं और जाने का रास्ता भी इन मजदूर साथियों को दिखायी नहीं दे रहा।

हीरो साइकिल में मजदूरों का 'लाल झण्डा हीरो साइकिल मजदूर यूनियन' के नाम से संगठन बना हुआ है। मजदूरों ने बर्बर कारखाना मालिकों के खिलाफ बहुत ही शानदार जोश, साहस और एकजुटता का प्रदर्शन किया था। इसी के फलस्वरूप कारखाने में आठ घण्टे दिहाड़ी लागू हुई; मालिक-मैनेजमेण्ट द्वारा की जाने वाली धक्काजोरी, अपमान, मारपीट, गाली-गलौच बन्द हुई। अगर माकपा-सीटू का जोर चलता तो वे हीरो साइकिल के मजदूरों के संघर्ष की धार को इस कदर कुन्द कर देते कि उन्हें ये अधिकार भी न मिलते। आज लाल झण्डा हीरो साइकिल मजदूर यूनियन के मजदूर साथियों में इन भितरघातियों की वजह से स्थिति बेहद निराशाजनक बनी हुई है। कुशलता के अनुसार वेतन बढ़ोत्तरी, महँगाई भत्ता, बोनस, मकान किराया, कारखाने से निकाले गये संघर्षशील मजदूर साथियों के खिलाफ दर्ज झूठे पुलिस केस वापस लेने, उन्हें काम पर वापस लेने आदि माँगों पर हीरो साइकिल के मजदूरों का संघर्ष आगे नहीं बढ़ाया गया।

मजदूरों को माकपा-सीटू के चालाक नेताओं ने बड़ी होशियारी से कानूनी लफ्फाजी में उलझाया हुआ है। शुरू से ही माकपा-सीटू के नेताओं ने पैसे के हिसाब-किताब में व्यवस्था और पारदर्शिता लाने के बारे में कुछ नहीं किया। इस बारे में वे चालाकी भरे बहाने बनाते रहे। यूनियन के पैसे के हिसाब-किताब में शुरू से होती आ रही घपलेबाजी का मामला सब मजदूरों के सामने है। हीरो साइकिल मजदूरों का कहना है कि संघर्ष की जीत के नाम पर माकपा-सीटू ने उनके हाथ में यूनियन रजिस्ट्रेशन का झुनझुना पकड़ा दिया है। जब मजदूरों को उनके अधिकार ही हासिल नहीं होने तो इस रजिस्ट्रेशन का क्या फायदा है?

बजाज संस के संघर्ष का तो माकपा-सीटू वालों ने और भी बुरा हाल किया है। बजाज संस के कुछ मजदूर साथियों ने उनका नाम ना छापे जाने की शर्त पर बिगुल मजदूर दस्ता को एक पत्र के जरिये सीटू-माकपा के कॉमरेडों के खिलाफ ग़ुस्सा कुछ इस तरह से जाहिर किया

बजाज संस का मालिक तीन साल से तरक्की मजदूरों को नहीं दे रहा है। और जब वर्कर अपने सीटू नेता के पास जाते हैं तरक्की के लिए तो वे बोलते हैं कि तरक्की की बात कानून में नहीं लिखी है।

आज बजाज संस में सीटू की यूनियन लगे पाँच वर्ष से ऊपर हो गये हैं जबकि यहाँ यूनियन का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ। इस बात को हर बार श्रमिक सीटू नेताओं के पास उठाते हैं। रजिस्ट्रेशन के लिए तो वे बोलते हैं कि कागज अप्लाई हुआ है। कभी कहते हैं डिमांड नोटिस वापस आ गया है। और रजिस्ट्रेशन कराने के नाम पर कितनी बार सौ-सौ रुपये प्रत्येक वर्कर से फण्ड ले चुके हैं। और वर्करों को ऍंधोरे में रखते हैं।

यहाँ तक कि मजदूरों के प्रधान बलराम सिंह पर जानलेवा हमले के बाद भी सीटू नेताओं ने मैनेजमेण्ट के ऊपर कोई कानूनी कार्रवाई तक न करके आपस में समझौता कर लिया। और मजदूरों को बताया तक नहीं। ...

आज भी श्रमिकों के ऊपर बहुत धक्केशाहियाँ हो रही हैं। अभी हाल में ही सी-94 में वर्कर और स्टाफ में कहा-सुनी हुआ। और स्टाफ वालों ने श्रमिक को पीटा और कम्पनी ने श्रमिकों को बाहर निकाल फेंक दिया और स्टाफ को रख लिया। इसमें सीटू के नेताओं ने कोई फैसला नहीं लिया।

आज यूनियन लगे पाँच वर्ष से ऊपर हो गया। लेकिन श्रमिकों को न ही वर्दी मिला, न ही हाउस एलाउंस मिला। न डीए मिला, न ही बोनस में बढ़ोत्तरी हुआ। न छुट्टी के पैसे में बढ़ोत्तरी हुआ। यहाँ तक कि बढ़ोत्तरी तो दूर की बात है जो छुट्टी का पैसा मिला है, वो पहले से भी कम पैसा मिला है। और इन नेता लोगों का कहना है कि जो मिला है, वो ठीक है।

श्रमिकों का जब भी पैसा बढ़ा उससे बहुत ही ज्यादा सीटू वालों ने प्रोडक्शन बढ़वा दिये। और आठ घण्टे काम करने के लिए कुर्बानी देने वाले कितने अपने महान नेताओं को वर्करों ने खो दिया था, लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि आज के दलाल नेताओं ने ख़ुद ही वर्करों से 12 घण्टे, 16 घण्टे, 20 घण्टे काम के करवा दिये हैं। और छुट्टी के दिन भी ओवरटाइम ये कम्पनियों में चलवाते हैं। और वर्करों के विरोध करने पर सीटू नेता कहते हैं जो मर्जी वो करो लेकिन हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है।

श्रमिकों के अन्दर के प्रधान लालेश्वर को जब कम्पनी के गुण्डों ने कम्पनी के अन्दर ही बहुत बुरी तरह पीटा तो सीटू नेताओं ने मजदूरों को चुप रहने के लिए मजबूर किया और कहा कि कानूनी कार्रवाई होगा। इस पर उन्होंने कोई संघर्ष नहीं होने दिया। इन सीटू वालों ने हमारे साथ बहुत धोखा किया है।

बजाज संस के मजदूर साथियों का यह पत्र इस बात की पुष्टि करता है कि माकपा-सीटू मालिक-भक्ति में बहुत गहरे उतर चुकी है। उनसे मजदूर हित की उम्मीद करना बेकार ही नहीं बल्कि मूर्खता भी है।

किसी भी चुनावी पार्टी की तरह माकपा के नेताओं का मकसद भी जनता का भला करना नहीं बल्कि जनता को मूर्ख बनाकर कुर्सियाँ हासिल करना है। माकपा का मजदूर विंग सीटू मजदूरों में उसका वोट बैंक बनाने का एक जरिया है। माकपा यह दावा करती है कि वह देश में क्रान्ति के लिए लड़ रही है, लेकिन जैसाकि उसका सारा इतिहास बताता है कि उसने आज तक पूँजीपतियों की ही सेवा की है। चुनाव पूँजीपतियों से लिये गये चन्दों से ही लड़े और जीते जा सकते हैं, इसलिए माकपा वास्तव में कभी पूँजीपतियों के खिलाफ नहीं जायेगी।

भले ही माकपा और सीटू ने अपने विश्वासघात, समझौतापरस्ती और दलाली से लुधियाना के मजदूर आन्दोलन में हार, पस्ती, निराशा का माहौल बनाने की कोशिश की है और उसमें वे सफल भी हुए हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं हो सकता कि मजदूर संघर्ष का रास्ता ही छोड़ देंगे।

हमें पूरा यकीन है कि मजदूरों के दिलों में शोषण, लूट, दमन, अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने का साहस कभी मर नहीं सकता। आज भले ही लुधियाना के बड़े कारखानों के संघर्षशील मजदूरों की पहलकदमी और जोश पर माकपा-सीटू के कारण निराशा छायी हो, लेकिन यह भी निश्चित है कि संघर्ष फिर अंगड़ाई लेगा। लेकिन यह संघर्ष तभी सही दिशा में पूरे जोशो-खरोश, पूरे जुझारूपन और साहस के साथ आगे बढ़ सकता है जब मजदूर आन्दोलन से इन भितरघातियों को उठाकर बाहर फेंक दिया जायेगा।

लखविन्दर

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4.1.10

बादाम मज़दूरों की 15 दिन लम्बी ऐतिहासिक हड़ताल समाप्त

मालिक पक्ष और यूनियन के बीच समझौते के साथ ख़त्म हुआ संघर्ष


31 दिसम्बर, नई दिल्ली। पिछले 15 दिनों से जारी दिल्ली के बादाम मज़दूरों की ऐतिहासिक हड़ताल आज शाम मालिक पक्ष से हुई वार्ता के बाद समाप्त हो गई। ज्ञात हो कि यह हड़ताल 16 दिसम्बर से शुरू हुई थी और इसमें करीब 20 हज़ार मज़दूर परिवार शिरकत कर रहे थे। इसे दिल्ली के असंगठित मज़दूरों की अब तक की सबसे बड़ी और सबसे बड़ी हड़ताल कहा जा रहा था। इस वार्ता के पहले भी एक वार्ता मालिक पक्ष और मज़दूर यूनियन के बीच हुई थी, लेकिन उसमें दोनों पक्ष किसी भी नतीजे पर पहुँच पाने में सफल नहीं हुए थे। उसके बाद हड़ताल जारी रही और आज अंततः दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ।

बादाम मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में पिछले 15 दिनों से जारी इस हड़ताल में मज़दूरों ने एक 5-सूत्रीय माँगपत्रक बादाम ठेकेदारों के सामने रखा था। इनमें मुख्य तौर पर श्रम कानूनों द्वारा प्रदत्त अधिकार शामिल थे। पहले बादाम मज़दूरों को एक बोरी बादाम संसाधित करने के लिए मात्र रुपये 50 मिलते थे। इसके अतिरिक्त, उन्हें कई-कई महीने की मज़दूरी का भुगतान नहीं किया जाता था। इसके अतिरिक्त, मज़दूरों के साथ गोदामों के भीतर उनके साथ गाली-गलौच और बदसलूकी आम थी। साथ ही, बादाम से निकलने वाले छिलके को ये ठेकेदार मज़दूरों को मनमानी कीमत पर बेचते थे, जिसे ये मज़दूर खाना पकाने के लिए ईंधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। यूनियन के नेतृत्व में मज़दूर माँग कर रहे थे कि मज़दूरों को एक बोरी बादाम के संसाधन पर कम-से-कम 70 रुपये मिलने चाहिए और साथ ही छिलका का एक बोरा उन्हें 20 रुपये में मिलना चाहिए। साथ ही, वे माँग कर रहे थे कि उनकी मज़दूरी का भुगतान महीने के पहले सप्ताह में हो जाना चाहिए।

मालिक पक्ष पिछले 15 दिनों से मज़दूरी न बढ़ाने पर अड़ा हुआ था और कह रहा था कि पहले मज़दूर हड़ताल तोड़कर काम पर आएँ और वे 16 जनवरी के बाद मज़दूरी बढ़ाने के बारे में सोचेंगे। लेकिन मज़दूर इस पर राज़ी नहीं थे। हड़ताल के दौरान एक मालिक की महिला मज़दूरों द्वारा पिटाई, पुलिस प्रशासन द्वारा हड़ताल को डरा-धमकाकर तोड़ने के असफल प्रयासों, दलालों और बिचैलियों द्वारा हड़ताल को तोड़ने की नाकाम कोशिशों के बाद मालिक के तरकश के तीर समाप्त हो चुके थे। 29 दिसम्बर के बाद यह स्पष्ट था कि यह अब वक्त की बात है कि मालिक पक्ष कब समझौता करता है। 31 दिसम्बर की सुबह ही कुछ मालिकों ने माँगों को यूनियन से वार्ता के बगैर मान लिया और काम शुरू करा दिया। इसके कारण मालिकों के पक्ष में फूट पड़ गई। अंततः शाम 6 बजे के करीब मालिकों के प्रतिनिधियों और मज़दूरों के प्रतिनिधियों के बीच वार्ता हुई और इस बात पर समझौता हुआ कि मालिक मज़दूरों को एक बोरी बादाम के संसाधन पर 60 रुपये देंगे, बादाम के छिलके को 20 रुपये में बेचेंगे और साथ ही मज़दूरों को मज़दूरी का भुगतान हर माह के पहले सप्ताह में कर देंगे।

इस समझौते के साथ मज़दूरों ने अपनी हड़ताल समाप्त की और 1 जनवरी से वे काम पर लौटेंगे। इस हड़ताल के समापन के साथ दिल्ली के असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों की अब तक की विशालतम हड़ताल का समापन हुआ। बादाम मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में हज़ारों असंगठित मज़दूरों ने सिद्ध किया कि वे लड़ सकते हैं और जीत सकते हैं। जाहिर है कि मज़दूर अपनी सभी माँगों को नहीं जीत सके। लेकिन इस हड़ताल का महत्व महज़ इतना नहीं रह गया था कि मज़दूरी कितनी बढ़ती है और कितनी नहीं। एक ऐसे उद्योग में जहाँ मज़दूरों को मालिक और ठेकेदार गुलामों की तरह खटाते थे, उनकी साथ लगातार बदसलूकी की जाती थी और उन्हें इंसान तक नहीं समझा जाता था, वहाँ मज़दूरों ने एक ऐतिहासिक और जुझारू लड़ाई लड़कर इज्जत का अपना हक हासिल किया। मालिकों को पहली बार मज़दूरों की ताक़त का अहसास हुआ और उनकी यह गलतफहमी दूर हो गयी कि मज़दूर उनकी ज़्यादतियों को चुपचाप बर्दाश्त करते रहेंगे और कभी कुछ नहीं बोलेंगे। हड़ताल के अंत के दौर तक मालिक मज़दूरों के सामने हर तरह से झुकने लगे थे। इसके अतिरिक्त, न सिर्फ मालिकों को मज़ूदरों की ताक़त का अन्दाज़ा चला, बल्कि पूरे इलाके में संगठित मज़दूरों की ताक़त एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी।

इस हड़ताल की एक और उपलब्धि यह रही कि सी.पी.आई. (एम.एल.) आदि जैसी चुनावी पार्टियों की ट्रेड यूनियनों को मज़दूरों ने किनारे कर दिया और बादाम मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में बिना किसी चुनावी पार्टी के सहयोग या समर्थन के अपनी लड़ाई को मुकाम तक पहुँचाया। तमाम ट्रेड यूनियनों के दल्लालों को मज़दूरों ने सिरे से नकार दिया। इस पूरी लड़ाई में चुनावी पार्टियों, आर.एस.एस., पुलिस प्रशासन समेत सभी प्रमुख ताक़तों के असली चेहरे को मज़दूरों ने पहचाना और यह समझा कि उन्हें अपनी लड़ाई को अपने बूते लड़ना है।

बादाम मज़दूर यूनियन के संयोजक आशीष कुमार ने कहा कि यह लड़ाई अन्त नहीं बल्कि एक शुरुआत है। आगे भी बादाम मज़दूर अपनी यूनियन के झण्डे तले अपने ऐेसे तमाम अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहेंगे जो अभी भी उनकी पहुँच से दूर हैं। आशीष ने कहा कि जब तक यह पूरा उद्योग अनौपचारिक और अवैध रूप से काम करता रहेगा और किसी कानून के दायरे में नहीं आएगा तब तक मज़दूरों की कानूनी लड़ाई का पहलू कमज़ोर रहेगा। यूनियन का अगला लक्ष्य है कि इस पूरे उद्योग को औपचारिक ढाँचा देने के लिए सरकार के श्रम विभाग से मिला जाय।

बिगुल मज़दूर अखबार के संवाददाता और दिल्ली के श्रमिकों पर शोध कर रहे अभिनव ने कहा कि यह संघर्ष आने वाले कई दशकों तक दिल्ली के मज़दूरों के जेहन में ताज़ा रहेगा। यह अपने किस्म का पहला संघर्ष था और इस संघर्ष ने इस मिथक को ध्वस्त कर दिया कि असंगठित मज़दूर संगठित होकर लड़ नहीं सकते। इलाकाई पैमाने पर मज़दूरों के संगठन खड़े करके असंगठित और बिखरे हुए मज़दूरों की लड़ाई को भी एक संगठित और विशाल रूप दिया जा सकता है। निश्चित रूप से इसकी अपनी चुनौतियाँ और मुश्किलें हैं लेकिन इस हड़ताल ने साबित किया है कि इन मुश्किलों को हल किया जा सकता है।

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21.12.09

2000 मज़दूरों ने विशाल चेतावनी रैली निकाली

दिल्ली के बादाम मज़दूरों की हड़ताल - 5वां दिन
पिछले 20 वर्षों में दिल्ली के असंगठित मज़दूरों की विशालतम हड़तालों में से एक हड़ताल अपने छठे दिन जारी
अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में आपूर्ति को धक्का, दिल्ली का बादाम संसाधन उद्योग ठप्प

20 दिसम्बर, दिल्ली। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के करावलनगर इलाके में स्थित विशालकाय बादाम संसाधन उद्योग लगातार छठे दिन भी ठप्प रहा। ज्ञात हो कि बादाम मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में करीब 30 हज़ार बादाम मज़दूरों ने अपने परिवारों समेत हड़ताल कर रखी है। 16 दिसम्बर की सुबह हड़ताल का एलान किया गया था। इस बीच 17 दिसम्बर की सुबह बादाम के गोदाम मालिकों ने अपने भाड़े के गुण्डों से बादाम तोड़ने वाली महिला मज़दूरों, यूनियन कार्यकर्ताओं आदि पर लाठी-डण्डों के साथ जानलेवा हमला किया जिसमें कई यूनियन कार्यकर्ताओं और मज़दूरों को गम्भीर चोट आई। आत्मरक्षा में मज़दूरों ने पथराव किया जिसमें 4 गुण्डे भी घायल हो गये। लेकिन पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए यूनियन के तीन नेताओं के ख़िलाफ़ धारा 107 व धारा 151 के तहत मामला दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया। ये यूनियन नेता 19 दिसम्बर की रात ज़मानत पर छूटे। शर्मनाक बर्ताव करते हुए करावलनगर पुलिस ने घायल हालत में इन यूनियन नेताओं को पुलिस थाने में जानबूझकर बिठा रखा और उन्हें चिकित्सीय सहायता तक नहीं प्रदान की। दूसरी ओर, हमला करने वाले गुण्डों और मालिकों का पुलिस ने बाइज्जत रिहा भी कर दिया और उनके विरुध्द कोई मामला भी दर्ज नहीं किया। इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह थी कि मज़दूरों से घबराई हुई पुलिस ने मज़दूरों से यह झूठ बोला कि मालिकों के ऊपर भी मामला दर्ज किया है। मालिकों ने दलित मज़दूरों और यूनियन कार्यकर्ताओं के विरुध्द जातिसूचक अपमानजन शब्दावली का भी इस्तेमला किया। इसके बावजूद पुलिस ने उन व्यक्तियों के विरुध्द कोई मामला दर्ज नहीं किया। मालिकों और ठेकेदारों को यह उम्मीद थी कि पुलिस के जरिये यूनियन के नेतृत्व को जेल में डलवाकर आन्दोलन को तोड़ा जा सकता है। लेकिन उनकी उम्मीदों के उलट, नेताओं की गिरफ्तारी और दमन से मज़दूरों का हौसला टूटने की बजाय और बुलन्द हो गया और 20 फीसदी मज़दूर जो हड़ताल में शामिल नहीं थे, वे भी हड़ताल में शामिल हो गये।
19 दिसम्बर को रिहाई के बाद मज़दूरों ने अपने नेताओं का गर्मजोशी से स्वागत किया और 20 दिसम्बर की सुबह करावलनगर के इलाके में एक ऐतिहासिक रैली का आयोजन किया। इस रैली को मज़दूरों ने पुलिस दमन और मालिकों के बर्बर रवैये के विरुध्द एक चेतावनी रैली के रूप में आयोजित किया। इसमें करीब 2000 मज़दूरों ने शिरकत की, जिसमें कि बड़े पैमाने पर महिला मज़दूर शामिल थीं। इस रैली को करावलनगर के प्रकाश विहार इलाके से शुरू करके पूरे पश्चिमी करावलनगर में निकाला गया। रैली के दौरान मज़दूर 'अब मज़दूरों की बारी है-हमारी हड़ताल जारी है', 'जेल के फाटक टूट गये-हमारे साथी छूट गये', 'मज़दूर हितों का हनन हुआ तो-खून बहेगा सड़कों पर', 'बादाम मज़दूर यूनियन-ज़िन्दाबाद', 'हमारी माँगें पूरी करो!' आदि जैसे नारे लगा रहे थे। करावलनगर इलाके के नागरिक इस विशाल जुलूस को देखकर चकित थे और उन्होंने मज़दूरों की माँगों का समर्थन भी किया। करावलनगर के इतिहास में यह सबसे बड़ी मज़दूर रैली थी। इस रैली के जरिये मज़दूरों ने अपनी जुझारू एकजुटता का प्रदर्शन किया और यह संकल्प दुहराया कि बिना अपनी माँगें जीते वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
मज़दूरों की हड़ताल के छठे दिन भी जारी रहने के कारण दिल्ली का बादाम संसाधन उद्योग एकदम ठप्प पड़ गया है। असंसाधित बादाम गोदामों में आकर हज़ारों बोरियों की तादाद में बेकार पड़ा हुआ है। दूसरी ओर क्रिस्मस और नये वर्ष के मौके पर बादाम की माँग देशी ही नहीं बल्कि अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में भी बढ़ती जा रही है। ग़ौरतलब है कि दिल्ली के पूरे बादाम संसाधन उद्योग में जिस बादाम का संसाधन होता है वह अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया व कई यूरोपीय कम्पनियों के बादाम होते हैं। ये कम्पनियाँ सस्ते श्रम को निचोड़ने के लिए इस बादाम को खारी बावली के मालिकों के पास भेजती हैं। ये बड़े मालिक छोटे-टटपुंजिये ठेकेदारों को यह काम ठेके पर देते हैं और ये छोटे ठेकेदार सभी श्रम कानूनों को ताक पर रखकर, सभी नियमों-कायदों की धज्जियाँ उड़ाते हुए यह काम मज़दूरों का बर्बर शोषण करते हुए करवाते हैं। ये ही वे मज़दूर हैं जो पिछले छह दिनों से हड़ताल पर डटे हुए हैं और यह माँग कर रहे हैं कि श्रम कानूनों द्वारा प्रदत्त सभी अधिकारों को पूरा किया जाय, मिसाल के तौर पर, न्यूनतम मज़दूरी के बराबर पीस रेट फिक्स किया जाय, यानी कि प्रति बोरी दर को न्यूनतम मज़दूरी के बराबर लाया जाय; मज़दूरी कार्ड व पहचान पत्र मुहैया कराया जाय; डबल रेट से ओवरटाइम का भुगतान हो; हर महीने के पहले सप्ताह में बकाया मज़दूरी का भुगतान किया जाय; और महिला मज़दूरों के साथ बदसलूकी और गाली-गलौच बन्द की जाय। पिछले वर्ष इन मज़दूरों ने बादाम मज़दूर यूनियन का गठन किया था और पिछले एक वर्ष से यूनियन के नेतृत्व में मज़दूर तमाम संघर्षों में शामिल हो चुके हैं। इस हड़ताल के कारण दिल्ली के ही बाज़ार में बादाम की कीमतें बढ़ती जा रही हैं।
बादाम मज़दूर यूनियन के संयोजक आशीष कुमार सिंह ने बताया, ''अब तक के संघर्ष में पुलिस प्रशासन ने पूरी तरह पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हुए मालिकों के निर्देशों पर काम किया है। हमें करावलनगर पुलिस प्रशासन पर कोई विश्वास नहीं है और मज़दूरों पर हमला करने वाले गुण्डों पर कार्रवाई के लिए हम सीधे पुलिस उपायुक्त, उत्तर-पूर्वी दिल्ली के पास शिकायत दर्ज करेंगे। अगर तब भी कार्रवाई नहीं हुई तो हम न्यायालय तक भी जाएँगे। लेकिन मज़दूरों पर हमला करने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। हड़ताल हमारा हथियार है। हम तब तक हड़ताल जारी रखेंगे जब तक कि हमारी सारी माँगें मान नहीं ली जातीं।''
यूनियन के ही योगेश ने बताया, ''यह पहला मौका है जब इतनी बड़ी तादाद में एकजुट होकर करावलनगर के मज़दूरों ने हड़ताल की है। इसके पहले भी कुछ छिटपुट हड़तालें हुई थीं, लेकिन तब बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल के मज़दूर एकजुट नहीं हो पाते थे और हड़तालें सफल नहीं हो पाती थीं। बादाम मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में यह पहला मौका है जब सभी मज़दूर जाति, गोत्र और क्षेत्र के बँटवारों को भुलाकर अपने वर्ग हित को लेकर एकजुट हुए हैं।'' योगेश ने बताया कि विभिन्न सूत्रों के अनुसार बादाम गोदाम मालिक यूनियन के नेतृत्व पर फिर से जानलेवा हमला करने की साज़िश रच रहे हैं। अगर ऐसी कोई कार्रवाई होती है तो इसका उचित जवाब दिया जाएगा। मालिकों को पुलिस का संरक्षण प्राप्त है। लेकिन इसके बावजूद संगठित मज़दूर ताक़त से टकरा पाना मालिकों के बस की बात नहीं है।

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19.12.09

बादाम मज़दूरों के नेता रिहा

बादाम मज़दूरों की हड़ताल चौथे दिन भी जारी

19 दिसम्बर, दिल्ली। करावलनगर के बादाम मज़दूर यूनियन के गिरफ्तार नेताओं आशीष कुमार सिंह, कुणाल जैन और प्रेमप्रकाश यादव शनिवार को जमानत पर रिहा हो गए. 17 दिसम्बर की सुबह बादाम के गोदाम मालिकों और उनके गुण्डों ने महिला मज़दूरों पर और यूनियन के सदस्यों पर लाठियों-डण्डों से जानलेवा हमला किया और इसमें कई महिला मज़दूर और यूनियन कार्यकर्ता गम्भीर रूप से घायल हो गये। आत्मरक्षा में मज़दूरों ने गुण्डों पर पथराव शुरू किया जिसमें मालिकों के करीब 4 लठैत घायल हो गये। इसके बाद पुलिस ने दोनों पक्षों के कुछ लोगों को हिरासत में लेकर उनका बयान लिया। लेकिन मालिकों और उनके गुण्डों पर पुलिस ने कोई भी कार्रवाई नहीं की जबकि यूनियन के कार्यकर्ताओं पर धारा 107 व धारा 151 के तहत मामला दर्ज़ कर लिया।
17 दिसम्बर को पुलिस ने बिना कोई चिकित्सीय सहायता प्रदान किये मज़दूर नेताओं को घायल हालत में ही गोकलपुरी थाने में लाॅक-अप में बन्द कर दिया। ज्ञात हो, कि यह मामला करावलनगर थाने के अन्तर्गत आता है लेकिन मज़दूरों से भयाक्रान्त पुलिस प्रशासन ने इन मज़दूर नेताओं को करावलनगर या खजूरी थाने में नहीं बन्द किया। जाहिर है कि पुलिस पूरी तरह मालिकों की ओर से कार्रवाई कर रही है। मालिकों को किराए के गुण्डे रखने की कोई ज़रूरत नहीं थी।
इस बीच करावलनगर इलाके में चौथे दिन भी हज़ारों की संख्या में मज़दूर हड़ताल स्थल पर मौजूद रहे। हड़ताल के जारी रहने से करावलनगर का पूरा बादाम संसाधन उद्योग ठप्प पड़ गया है। बादाम मज़दूर यूनियन के नवीन ने कहा कि करावलनगर पुलिस थाने के पक्षपातपूर्ण व्यवहार और मज़दूरों की ओर से प्राथमिकी दर्ज़ न कराए जाने के कारण यूनियन सीधे पुलिस उपायुक्त, उत्तर-पूर्वी दिल्ली के पास शिकायत दर्ज़ कराएगी और अगर तब भी कार्रवाई नहीं होती है तो फिर हमारे पास अदालत जाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा। ग़ौरतलब है कि बादाम मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में पिछले एक वर्ष से बादाम मज़दूर अपने कानूनी हक़ों की माँग कर रहे हैं और साथ ही बादाम संसाधन उद्योग को सरकार द्वारा औपचारिक दर्ज़ा दिये जाने की माँग कर रहे हैं। फिलहाल, सभी बादाम गोदाम मालिक गैर-कानूनी ढंग से बिना किसी सरकारी लाईसेंस या मान्यता के ठेके पर मज़दूरों से अपने गोदामों में काम करवा रहे हैं। इसमें बड़े पैमाने पर महिला मज़दूर हैं लेकिन उनके लिए शौचालय या शिशु घर जैसी कोई सुविधा नहीं है। बादाम मज़दूरों को तेज़ाब में डाल कर सुखाए गए बादामों को हाथों, पैरों और दांतों से तोड़ना पड़ता है। उनके लिए सुरक्षा के कोई इंतज़ाम नहीं हैं और उन्हें टी.बी., खांसी, आदि जैसे रोग आम तौर पर होते रहते हैं। महिला मज़दूरों के बच्चे भी काफ़ी कम उम्र में ही जानलेवा बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। बादाम मज़दूर यूनियन इन मज़दूरों के लिए बेहतर कार्य स्थितियों की भी माँग कर रही है। लेकिन मालिक और ठेकेदार पुलिस प्रशासन और स्थानीय नेताओं और गुण्डों के बल पर अपनी मनमानी और गुण्डागर्दी चला रहे है। बादाम मज़दूर यूनियन के योगेश ने कहा कि लेकिन अब वे दिन लद गये हैं जब मज़दूर गुलामों की तरह चुपचाप खटते रहते थे और कोई आवाज़ नहीं उठाते थे। वे एक यूनियन के रूप में संगठित हो चुके हैं और अपने कानूनी हक़ों को जीतने से नीचे वे किसी जीत पर नहीं रुकेंगे।
बादाम मज़दूर यूनियन के आज रिहा हुए संयोजक आशीष कुमार सिंह ने कहा कि बादाम के ठेकेदार बुरी तरह से डर गये हैं। पुलिस को अपने साथ मिलाकर और गुण्डों के बल पर निहत्थे मज़दूरों पर कायराना हमला कराकर उन्होंने साबित कर दिया है कि वे झुण्ड में निहत्थे महिलाओं और बच्चों पर ही अपने पौरुष का प्रदर्शन कर सकते हैं। लेकिन महिला मज़दूरों ने उनके हमले का मुँहतोड़ जवाब देकर साबित कर दिया है कि वे ऐसे किसी भी नापाक हमले का जवाब उसी भाषा में दे सकते हैं। अब वे दिन गये जब मज़दूर चुपचाप मालिकों की मार और गाली-गलौच को बर्दाश्त करते थे। मज़दूर अपनी एकता के बल पर बिकी हुई पुलिस और मालिकों के गुण्डों, दोनों से टकराने की ताक़त रखते हैं। इस कायराना हमले ने मज़दूरों के हौसले को तोड़ने की बजाय उन्हें और बुलन्द कर दिया है। यह अकारण नहीं है कि करीब 15 फीसदी मज़दूर जो भय के कारण हड़ताल में शामिल नहीं थे, मज़दूर नेताओं की गिरफ्तारी के बाद वे भी हड़ताल में शामिल हो चुके हैं और उन्होंने मालिकों की मुनाफे की मशीनरी का चक्का पूरी तरह जाम कर दिया है।

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17.12.09

बादाम तोड़ने वाले 25-25 हज़ार मज़दूर हड़ताल पर

नई दिल्‍ली के करावल नगर इलाके में बादाम तोड़ने वाले मज़दूरों ने हड़ताल की घोषणा कर दी है। 'बादाम मज़दूर यूनियन' के बैनर तले इन मज़दूरों के हड़ताल पर जाने से अमेरिका और ऑस्‍ट्रेलिया सहित कई यूरोपीय देशों में बादाम निर्यात प्रभावित हो गया है। बादाम मज़दूर यूनियन के संयोजक आशीष ने कहा कि सरकार ने 1970 में ठेका मज़दूरी क़ानून के तहत जो बुनियादी अधिकार दिए थे उनका यहां कोई पालन नहीं हो रहा है। श्रम क़ानूनों के उल्‍लंघन से यहां के 20 हज़ार से ज्‍़यादा मज़दूर त्रस्‍त हैं। यूनियन के सदस्‍य राहुल ने कहा कि बेहिसाब महंगाई में न्‍यूनतम मज़दूरी भी न मिलने से मज़दूरों के परिवारों के सामने दाल-रोटी की चिंता बढ़ गयी है। लिहाज़ा मज़दूरों ने काम बंद कर दिया है।

जानकारी के मुताबिक, 23 किलो की एक बोरी पर मज़दूरों को केवल 50 रुपये मिलते हैं। दिनभर में हाड़-तोड़ मेहनत कर एक मज़दूर मुश्किल से दो बोरी बादाम तोड़ पाता है। इसके अलावा उनका पिछला हिसाब भी व्‍यापारी रोक कर उन्‍हें धमकी देता रहता है। वे सामाजिक सुरक्षा की सुविधा से भी वंचित हैं।

(जनसत्ता (17 दिसंबर) से साभार )

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बादाम मज़दूर यूनियन के संयोजकों पर हमला, पुलिस ने गुण्‍डो की जगह संयोजकों को ही गिरफ्तार किया

करावल नगर के बादाम मज़दूर कल से मज़दूरी बढ़ाने की मांग को लेकर हड़तालत पर हैं। आज सुबह क़रीब 1500 महिला-पुरुष मज़दूर अपनी मांग के समर्थन में यूनियन के संयोजक आशीष तथा अन्‍य लोगों की अगुवाई में इलाकाई पैमाने का जुलूस निकाल रहे थे। ये मज़दूर प्रति बोरा 40 रुपये की बेहद मामूली दरों पर ठेकेदारों के लिए काम करते हैं। आन्‍दोलन के बढ़ते जनसमर्थन से बौखलाए बादाम ठेकेदारों ने सुबह क़रीब 11:30 बजे अपने गुण्‍डो से जुलूस पर हमला करा दिया। हमले में आशीष, कुणाल और प्रेमप्रकाश बुरी तरह घायल हो गये। ठेकेदारों की बर्बरता से बौखलाए मज़दूरों ने इस पर ज़बर्दस्‍त प्रतिरोध किया।

इस पूरे मामले में करावल नगर पुलिस की भूमिका साफ़तौर पर मज़दूर विरोधी दिखी। पुलिस दिनभर जहां एक ओर मज़दूरों की लिखित नामजद तहरीर पर एफआईआर दर्ज करने का आश्‍वासन देती रही, वहीं शाम 7 बजहे तक ठेकेदार और उनके गुण्‍डो के खिलाफ न तो एफआईआर ही दर्ज हुई और न ही घायल मज़दूरों का मेडिकल मुआयना कराया गया। उल्‍टे पुलिस ने बादाम मज़दूर यूनियन के संयोजक आशीष तथा कुणाल और प्रेमप्रकाश को धारा 107/151 के तहत गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस की इस अंधेरगर्दी से पूरे क्षेत्र के मज़दूरों में गुस्‍से की लहर दौड़ गयी। इस पूरे इलाके में क़रीब 25,000 मज़दूर बादाम तोड़ने का काम करते हैं। इन मज़दूरों के ठेकेदार बेहद निरंकुश हैं और क़रीब-क़रीब मुफ्त में मज़दूरों से काम करवाने के आदि हैं। बादाम मज़दूर यूनियन ने गुण्‍डों द्वारा मारपीट और पुलिस की मालिक परस्‍त भूमिका की तीखे शब्‍दों में निंदा की है। यूनियन ने बताया कि कल एक प्रतिनिधिमण्‍डल पुलिस के उच्‍चाधिकारियों से मिलेगा और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेगा। युनियन का कहना हैकि यदि उन्‍हें न्‍याय नहीं मिला तो वे आन्‍दोलनात्‍मक रुख अपनाने के लिए तैयार रहेंगे।

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17.10.09

मज़दूर संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों के नाम अपील

मज़दूर आन्दोलन को कुचलने के लिए तीन नेतृत्वकारी युवा कार्यकर्ता झूठे आरोपों में गिरफ्तार,
9 मजदूरों पर फर्जी मुकदमे कायम

मामूली धाराओं में भी 22 अक्टूबर तक ज़मानत देने से इंकार, हिरासत में पिटाई

''नक्सली'', ''आतंकवादी'' होने का आरोप लगाकर लंबे समय तक बंद रखने की तैयारी

मालिकों की शह पर पुलिसिया आतंकराज


पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में करीब ढाई महीने से चल रहे मज़दूर आन्दोलन को कुचलने के लिए प्रशासन ने फैक्ट्री मालिकों के इशारे पर एकदम नंगा आतंकराज कायम कर दिया है। गिरफ्तारियां
, फर्जी मुकदमे, मीडिया के जरिए दुष्प्रचार व धमकियों के जरिए मालिक-प्रशासन-नेताशाही का गंठजोड़ किसी भी कीमत पर इस न्यायपूर्ण आंदोलन को कुचलने पर आमादा है।

15 अक्टूबर की रात संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा के तीन नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं - प्रशांत, प्रमोद कुमार और तपीश मैंदोला को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस उन पर शांति भंग जैसी मामूली धाराएं ही लगा पाई लेकिन फिर भी 16 अक्टूबर को सिटी मजिस्ट्रेट ने उन्हें ज़मानत देने से इंकार करके 22 अक्टूबर तक जेल भेज दिया। इससे पहले 15 अक्टूबर की रात ज़िला प्रशासन ने तीनों नेताओं को बातचीत के लिए एडीएम सिटी के कार्यालय में बुलाया जहां काफी देर तक उन्हें जबरन बैठाये रखा गया और उनके मोबाइल फोन बंद कर दिये गये। उन्हें आन्दोलन से अलग हो जाने के लिए धमकियां दी गईं। इसके बाद उन्हें कैंट थाने ले जाया गया जहां उनके साथ मारपीट की गई। इसके अगले दिन मालिकों की ओर से इन तीन नेताओं के अलावा 9 मजदूरों पर जबरन मिल बंद कराने, धमकियां देने जैसे आरोपों में एकदम झूठा मुकदमा दर्ज कर लिया गया।

गिरफ्तारी वाले दिन से ही जिला प्रशासन के अफसर ऐसे बयान दे रहे हैं कि इन मजदूर नेताओं को ''माओवादी'' होने की आशंका में गिरफ्तार किया गया है और उनके पास से ''आपत्तिाजनक'' साहित्य आदि बरामद किया गया है। उल्लेखनीय है कि गोरखपुर के सांसद की अगुवाई में स्थानीय उद्योगपतियों और प्रशासन की ओर से शुरू से ही आन्दोलन को बदनाम करने के लिए इन नेताओं पर ''नक्सली'' और ''बाहरी'' होने का आरोप लगाया जा रहा है। कुछ अफसरों ने स्थानीय पत्रकारों को बताया है कि पुलिस इन नेताओं को लंबे समय तक अंदर रखने के लिए मामला तैयार कर रही है।

इससे पहले 15 अक्टूबर को जिलाधिकारी कार्यालय में अनशन और धरने पर बैठे मजदूरों पर हमला बोलकर उन्हें वहां से हटा दिया गया। महिला मजदूरों को घसीट-घसीटकर वहां से हटाया गया। प्रशांत, प्रमोद एवं तपीश को ले जाने का विरोध कर रही महिलाओं के साथ मारपीट की गई।

ये मजदूर स्वयं प्रशासन द्वारा पिछले 24 सितम्बर को कराये गये समझौते को लागू कराने की मांग पिछले कई दिनों से प्रशासन से कर रहे थे। 3 अगस्त से जारी आन्दोलन के पक्ष में जबर्दस्त जनदबाव के चलते प्रशासन ने समझौता कराया था लेकिन मिलमालिकों ने उसे लागू ही नहीं किया। समझौते के बाद दो सप्ताह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद आधे से अधिक मजदूरों को काम पर नहीं लिया गया है। थकहारकर 14 अक्टूबर से जब वे डीएम कार्यालय पर अनशन पर बैठे तो प्रशासन पूरी ताकत से उन पर टूट पड़ा।

मॉडर्न लेमिनेटर्स लि. और मॉडर्न पैकेजिंग लि. के इन मजदूरों की मांगें बेहद मामूली हैं। वे न्यूनतम मजदूरी, जॉब कार्ड, ईएसआई कार्ड देने जैसे बेहद बुनियादी हक मांग रहे हैं, श्रम कानूनों के महज़ कुछ हिस्सों को लागू करने की मांग कर रहे हैं। बिना किसी सुविधा के 12-12 घंटे, बेहद कम मजदूरी पर, अत्यंत असुरक्षित और असहनीय परिस्थितियों में ये मजदूर आधुनिक गुलामों की तरह से काम करते रहे हैं। गोरखपुर के सभी कारखानों में ऐसे ही हालात हैं। किसी कारखाने में यूनियन नहीं है, संगठित होने की किसी भी कोशिश को फौरन कुचल दिया जाता है। पहली बार करीब पांच महीने पहले तीन कारखानों के मजूदरों ने संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा बनाकर न्यूनतम मजदूरी देने और काम के घंटे कम करने की लड़ाई लड़ी और आंशिक कामयाबी पायी। इससे बरसों से नारकीय हालात में खट रहे हजारों अन्य मजदूरों को भी हौसला मिला। इसीलिए यह मजदूर आन्दोलन इन दो कारखानों के ही नहीं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के तमाम उद्योगपतियों को बुरी तरह खटक रहा है और वे हर कीमत पर इसे कुचलकर मजदूरों को ''सबक सिखा देना'' चाहते हैं। कारखाना मालिक पवन बथवाल दबंग कांग्रेसी नेता है और भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ का उसे खुला समर्थन प्राप्त है। प्रशासन और श्रम विभाग के अफसर बिके हुए हैं। शहर में आम चर्चा है कि मालिकों ने अफसरों को खरीदने के लिए दोनों हाथों से पैसा लुटाया है।

मजदूरों ने पिछले दो महीनों के दौरान गोरखपुर से लेकर लखनऊ तक, हर स्तर पर बार-बार अपनी बात पहुंचायी है लेकिन ''सर्वजन हिताय'' की बात करने वाली सरकार कान में तेल डालकर सो रही है।

मजदूरों और नेतृत्व के लोगों को डराने-धमकाने, फोड़ने की हर कोशिश नाकाम हो जाने के बाद पिछले महीने से यह सुनियोजित मुहिम छेड़ दी गई कि इस आन्दोलन को ''माओवादी आंतकवादी'' और ''बाहरी तत्व'' चला रहे हैं और यह ''पूर्वी उत्तर प्रदेश को अस्थिर करने की साज़िश'' है। इससे बड़ा झूठ कोई नहीं हो सकता। संघर्ष मोर्चा में सक्रिय ये तीनों ही कार्यकर्ता जनसंगठनों से लंबे समय से जुड़कर काम करते रहे हैं। प्रशांत और प्रमोद विगत कई वर्षों से गोरखपुर के छात्रों और नौजवानों के बीच सामाजिक काम करते रहे हैं। पिछले वर्ष 'गीडा' के एक कारखाने के मज़दूरों तथा नगर महापालिका और विश्वविद्यालय के सफाई कर्मचारियों के आन्दोलनों में भी उनकी सक्रियता थी। शहर के अधिकांश प्रबुद्ध नागरिक और मज़दूर उन्हें जानते हैं। तपीश मैंदोला मज़दूर अखबार 'बिगुल' से जुड़े हैं और श्रम मामलों के विशेषज्ञ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। कई वर्षों से वे नोएडा, गाज़ियाबाद के सफाई मज़दूरों और फैक्ट्री मज़दूरों के बीच काम करते रहे हैं। इन दिनों उनके नेतृत्व में मऊ, मैनपुरी और इलाहाबाद में नरेगा के मज़दूर अपनी माँगों को लेकर संगठित हो रहे हैं। तपीश के नेतृत्व में दिल्ली और आसपास से मज़दूरों के खोये हुए बच्चों के बारे में प्रस्तुत बहुचर्चित रिपोर्ट पर इन दिनों दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। ये तीनों साथी जन-आधारित राजनीति के पक्षधर हैं और आतंकवाद की राजनीति के विरोधी हैं।

किसी भी जनान्दोलन को ''माओवाद'' का ठप्पा लगाकर कुचलने के नये सरकारी हथकंडे का यह एक नंगा उदाहरण है। इसका पुरज़ोर विरोध किया जाना बेहद ज़रूरी है। यह तमाम इंसाफ़पसंद नागरिकों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, छात्र-युवा कार्यकर्ताओं को सत्ता की सीधी चुनौती है! हमारी आपसे अपील है कि हर संभव तरीके से अपना विरोध दर्ज कराए।

आप क्या कर सकते हैं :

- मज़दूर आन्दोलन के दमन और मजदूर नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री, प्रमुख सचिव, श्रम और श्रम मंत्री को, तथा गोरखपुर के जिलाधिकारी को फैक्स, ईमेल या स्पीडपोस्ट से विरोधपत्र भेजें। ईमेल की एक प्रति कृपया हमें भी फारवर्ड कर दें।

- इस मुद्दे पर बैठकें तथा धरना-विरोध प्रदर्शन आयोजित करें।

- अपने संगठनों की ओर से अपनी ओर से इसके विरोध में बयान जारी करें और हस्ताक्षर अभियान चलाकर उपरोक्त पतों पर भेजें।

- दिल्ली में 21 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश भवन पर आयोजित विरोध प्रदर्शन में शामिल हों।


गोरखपुर के मजदूर आन्दोलन के समर्थक बुद्धिजीवियों
, आम नागरिकों, छात्रों-युवाओं की ओर से,

कात्यायनी, सत्यम, मीनाक्षी, रामबाबू, कमला पाण्डेय, संदीप, संजीव माथुर, जयपुष्प, कपिल स्वामी, अभिनव, सुखविन्दर, डा. दूधनाथ, शिवार्थ पाण्डेय, अजय स्वामी, शिवानी कौल, लता, श्वेता, नेहा, लखविन्दर, राजविन्दर, आशीष, योगेश स्वामी, नमिता, विमला सक्करवाल, चारुचन्द्र पाठक, रूपेश राय, जनार्दन, समीक्षा, राजेन्द्र पासवान...

पतों एवं फोन-फैक्स नंबरों की सूची

Commissioner

Office of the Commissioner

Collectrate

Gorakhpur - 273001

Fax: 0551 - 2338817


Commissioner:

PK Mahanty

Mobile: 9936581000

District Magistrate

Office of the District Magistrate

Collectrate

Gorakhpur - 273001

Fax: 0551 - 2334569


DM: AK Shukla

Mobile: 9454417544

City Magistrate:

Akhilesh Tiwari

Mobile: 9454416211

Dy Inspector General of Police

Phone: 0551 - 2201187 / 2333442

Cantt., Gorakhpur

Dy. Labour Commissioner,

Labour Office

Civil Lines

Gorakhpur-273001

DLC

ML Choudhuri

Mobile: 9838123667

Governor

BL Joshi

Raj Bhavan, Lucknow, 226001

Phone: 0522-2220331, 2236992, 2220494

Fax: 0522-2223892

Special Secretary to Governor: 0522-2236113

Chief Minister

Km. Mayawati

Fifth Floor, Secretariat Annexe

Lucknow-226001

Phone: 2215501 (Pffice)

Phone:2236838 2236985 (Res)

Fax: 0522 - 2235733, 2239234, 2236181 2239296


Shri Badshah Singh

Labour Minister,

Department of Labour

Secretariat, Lucknow

Fax: 0522 - 2238925



Principal Secretary, Labour

Department of Labour

Secretariat, Lucknow - 226001

Fax: 0522 - 2237831

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बिगुल के बारे में

बिगुल पुस्तिकाएं
1. कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन और उसका ढाँचा -- लेनिन

2. मकड़ा और मक्खी -- विल्हेल्म लीब्कनेख़्त

3. ट्रेडयूनियन काम के जनवादी तरीके -- सेर्गेई रोस्तोवस्की

4. मई दिवस का इतिहास -- अलेक्ज़ैण्डर ट्रैक्टनबर्ग

5. पेरिस कम्यून की अमर कहानी

6. बुझी नहीं है अक्टूबर क्रान्ति की मशाल

7. जंगलनामा : एक राजनीतिक समीक्षा -- डॉ. दर्शन खेड़ी

8. लाभकारी मूल्य, लागत मूल्य, मध्यम किसान और छोटे पैमाने के माल उत्पादन के बारे में मार्क्सवादी दृष्टिकोण : एक बहस

9. संशोधनवाद के बारे में

10. शिकागो के शहीद मज़दूर नेताओं की कहानी -- हावर्ड फास्ट

11. मज़दूर आन्दोलन में नयी शुरुआत के लिए

12. मज़दूर नायक, क्रान्तिकारी योद्धा

13. चोर, भ्रष् और विलासी नेताशाही

14. बोलते आंकड़े चीखती सच्चाइयां


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