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21.12.09

2000 मज़दूरों ने विशाल चेतावनी रैली निकाली

दिल्ली के बादाम मज़दूरों की हड़ताल - 5वां दिन
पिछले 20 वर्षों में दिल्ली के असंगठित मज़दूरों की विशालतम हड़तालों में से एक हड़ताल अपने छठे दिन जारी
अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में आपूर्ति को धक्का, दिल्ली का बादाम संसाधन उद्योग ठप्प

20 दिसम्बर, दिल्ली। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के करावलनगर इलाके में स्थित विशालकाय बादाम संसाधन उद्योग लगातार छठे दिन भी ठप्प रहा। ज्ञात हो कि बादाम मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में करीब 30 हज़ार बादाम मज़दूरों ने अपने परिवारों समेत हड़ताल कर रखी है। 16 दिसम्बर की सुबह हड़ताल का एलान किया गया था। इस बीच 17 दिसम्बर की सुबह बादाम के गोदाम मालिकों ने अपने भाड़े के गुण्डों से बादाम तोड़ने वाली महिला मज़दूरों, यूनियन कार्यकर्ताओं आदि पर लाठी-डण्डों के साथ जानलेवा हमला किया जिसमें कई यूनियन कार्यकर्ताओं और मज़दूरों को गम्भीर चोट आई। आत्मरक्षा में मज़दूरों ने पथराव किया जिसमें 4 गुण्डे भी घायल हो गये। लेकिन पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए यूनियन के तीन नेताओं के ख़िलाफ़ धारा 107 व धारा 151 के तहत मामला दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया। ये यूनियन नेता 19 दिसम्बर की रात ज़मानत पर छूटे। शर्मनाक बर्ताव करते हुए करावलनगर पुलिस ने घायल हालत में इन यूनियन नेताओं को पुलिस थाने में जानबूझकर बिठा रखा और उन्हें चिकित्सीय सहायता तक नहीं प्रदान की। दूसरी ओर, हमला करने वाले गुण्डों और मालिकों का पुलिस ने बाइज्जत रिहा भी कर दिया और उनके विरुध्द कोई मामला भी दर्ज नहीं किया। इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह थी कि मज़दूरों से घबराई हुई पुलिस ने मज़दूरों से यह झूठ बोला कि मालिकों के ऊपर भी मामला दर्ज किया है। मालिकों ने दलित मज़दूरों और यूनियन कार्यकर्ताओं के विरुध्द जातिसूचक अपमानजन शब्दावली का भी इस्तेमला किया। इसके बावजूद पुलिस ने उन व्यक्तियों के विरुध्द कोई मामला दर्ज नहीं किया। मालिकों और ठेकेदारों को यह उम्मीद थी कि पुलिस के जरिये यूनियन के नेतृत्व को जेल में डलवाकर आन्दोलन को तोड़ा जा सकता है। लेकिन उनकी उम्मीदों के उलट, नेताओं की गिरफ्तारी और दमन से मज़दूरों का हौसला टूटने की बजाय और बुलन्द हो गया और 20 फीसदी मज़दूर जो हड़ताल में शामिल नहीं थे, वे भी हड़ताल में शामिल हो गये।
19 दिसम्बर को रिहाई के बाद मज़दूरों ने अपने नेताओं का गर्मजोशी से स्वागत किया और 20 दिसम्बर की सुबह करावलनगर के इलाके में एक ऐतिहासिक रैली का आयोजन किया। इस रैली को मज़दूरों ने पुलिस दमन और मालिकों के बर्बर रवैये के विरुध्द एक चेतावनी रैली के रूप में आयोजित किया। इसमें करीब 2000 मज़दूरों ने शिरकत की, जिसमें कि बड़े पैमाने पर महिला मज़दूर शामिल थीं। इस रैली को करावलनगर के प्रकाश विहार इलाके से शुरू करके पूरे पश्चिमी करावलनगर में निकाला गया। रैली के दौरान मज़दूर 'अब मज़दूरों की बारी है-हमारी हड़ताल जारी है', 'जेल के फाटक टूट गये-हमारे साथी छूट गये', 'मज़दूर हितों का हनन हुआ तो-खून बहेगा सड़कों पर', 'बादाम मज़दूर यूनियन-ज़िन्दाबाद', 'हमारी माँगें पूरी करो!' आदि जैसे नारे लगा रहे थे। करावलनगर इलाके के नागरिक इस विशाल जुलूस को देखकर चकित थे और उन्होंने मज़दूरों की माँगों का समर्थन भी किया। करावलनगर के इतिहास में यह सबसे बड़ी मज़दूर रैली थी। इस रैली के जरिये मज़दूरों ने अपनी जुझारू एकजुटता का प्रदर्शन किया और यह संकल्प दुहराया कि बिना अपनी माँगें जीते वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
मज़दूरों की हड़ताल के छठे दिन भी जारी रहने के कारण दिल्ली का बादाम संसाधन उद्योग एकदम ठप्प पड़ गया है। असंसाधित बादाम गोदामों में आकर हज़ारों बोरियों की तादाद में बेकार पड़ा हुआ है। दूसरी ओर क्रिस्मस और नये वर्ष के मौके पर बादाम की माँग देशी ही नहीं बल्कि अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में भी बढ़ती जा रही है। ग़ौरतलब है कि दिल्ली के पूरे बादाम संसाधन उद्योग में जिस बादाम का संसाधन होता है वह अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया व कई यूरोपीय कम्पनियों के बादाम होते हैं। ये कम्पनियाँ सस्ते श्रम को निचोड़ने के लिए इस बादाम को खारी बावली के मालिकों के पास भेजती हैं। ये बड़े मालिक छोटे-टटपुंजिये ठेकेदारों को यह काम ठेके पर देते हैं और ये छोटे ठेकेदार सभी श्रम कानूनों को ताक पर रखकर, सभी नियमों-कायदों की धज्जियाँ उड़ाते हुए यह काम मज़दूरों का बर्बर शोषण करते हुए करवाते हैं। ये ही वे मज़दूर हैं जो पिछले छह दिनों से हड़ताल पर डटे हुए हैं और यह माँग कर रहे हैं कि श्रम कानूनों द्वारा प्रदत्त सभी अधिकारों को पूरा किया जाय, मिसाल के तौर पर, न्यूनतम मज़दूरी के बराबर पीस रेट फिक्स किया जाय, यानी कि प्रति बोरी दर को न्यूनतम मज़दूरी के बराबर लाया जाय; मज़दूरी कार्ड व पहचान पत्र मुहैया कराया जाय; डबल रेट से ओवरटाइम का भुगतान हो; हर महीने के पहले सप्ताह में बकाया मज़दूरी का भुगतान किया जाय; और महिला मज़दूरों के साथ बदसलूकी और गाली-गलौच बन्द की जाय। पिछले वर्ष इन मज़दूरों ने बादाम मज़दूर यूनियन का गठन किया था और पिछले एक वर्ष से यूनियन के नेतृत्व में मज़दूर तमाम संघर्षों में शामिल हो चुके हैं। इस हड़ताल के कारण दिल्ली के ही बाज़ार में बादाम की कीमतें बढ़ती जा रही हैं।
बादाम मज़दूर यूनियन के संयोजक आशीष कुमार सिंह ने बताया, ''अब तक के संघर्ष में पुलिस प्रशासन ने पूरी तरह पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हुए मालिकों के निर्देशों पर काम किया है। हमें करावलनगर पुलिस प्रशासन पर कोई विश्वास नहीं है और मज़दूरों पर हमला करने वाले गुण्डों पर कार्रवाई के लिए हम सीधे पुलिस उपायुक्त, उत्तर-पूर्वी दिल्ली के पास शिकायत दर्ज करेंगे। अगर तब भी कार्रवाई नहीं हुई तो हम न्यायालय तक भी जाएँगे। लेकिन मज़दूरों पर हमला करने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। हड़ताल हमारा हथियार है। हम तब तक हड़ताल जारी रखेंगे जब तक कि हमारी सारी माँगें मान नहीं ली जातीं।''
यूनियन के ही योगेश ने बताया, ''यह पहला मौका है जब इतनी बड़ी तादाद में एकजुट होकर करावलनगर के मज़दूरों ने हड़ताल की है। इसके पहले भी कुछ छिटपुट हड़तालें हुई थीं, लेकिन तब बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल के मज़दूर एकजुट नहीं हो पाते थे और हड़तालें सफल नहीं हो पाती थीं। बादाम मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में यह पहला मौका है जब सभी मज़दूर जाति, गोत्र और क्षेत्र के बँटवारों को भुलाकर अपने वर्ग हित को लेकर एकजुट हुए हैं।'' योगेश ने बताया कि विभिन्न सूत्रों के अनुसार बादाम गोदाम मालिक यूनियन के नेतृत्व पर फिर से जानलेवा हमला करने की साज़िश रच रहे हैं। अगर ऐसी कोई कार्रवाई होती है तो इसका उचित जवाब दिया जाएगा। मालिकों को पुलिस का संरक्षण प्राप्त है। लेकिन इसके बावजूद संगठित मज़दूर ताक़त से टकरा पाना मालिकों के बस की बात नहीं है।

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19.12.09

बादाम मज़दूरों के नेता रिहा

बादाम मज़दूरों की हड़ताल चौथे दिन भी जारी

19 दिसम्बर, दिल्ली। करावलनगर के बादाम मज़दूर यूनियन के गिरफ्तार नेताओं आशीष कुमार सिंह, कुणाल जैन और प्रेमप्रकाश यादव शनिवार को जमानत पर रिहा हो गए. 17 दिसम्बर की सुबह बादाम के गोदाम मालिकों और उनके गुण्डों ने महिला मज़दूरों पर और यूनियन के सदस्यों पर लाठियों-डण्डों से जानलेवा हमला किया और इसमें कई महिला मज़दूर और यूनियन कार्यकर्ता गम्भीर रूप से घायल हो गये। आत्मरक्षा में मज़दूरों ने गुण्डों पर पथराव शुरू किया जिसमें मालिकों के करीब 4 लठैत घायल हो गये। इसके बाद पुलिस ने दोनों पक्षों के कुछ लोगों को हिरासत में लेकर उनका बयान लिया। लेकिन मालिकों और उनके गुण्डों पर पुलिस ने कोई भी कार्रवाई नहीं की जबकि यूनियन के कार्यकर्ताओं पर धारा 107 व धारा 151 के तहत मामला दर्ज़ कर लिया।
17 दिसम्बर को पुलिस ने बिना कोई चिकित्सीय सहायता प्रदान किये मज़दूर नेताओं को घायल हालत में ही गोकलपुरी थाने में लाॅक-अप में बन्द कर दिया। ज्ञात हो, कि यह मामला करावलनगर थाने के अन्तर्गत आता है लेकिन मज़दूरों से भयाक्रान्त पुलिस प्रशासन ने इन मज़दूर नेताओं को करावलनगर या खजूरी थाने में नहीं बन्द किया। जाहिर है कि पुलिस पूरी तरह मालिकों की ओर से कार्रवाई कर रही है। मालिकों को किराए के गुण्डे रखने की कोई ज़रूरत नहीं थी।
इस बीच करावलनगर इलाके में चौथे दिन भी हज़ारों की संख्या में मज़दूर हड़ताल स्थल पर मौजूद रहे। हड़ताल के जारी रहने से करावलनगर का पूरा बादाम संसाधन उद्योग ठप्प पड़ गया है। बादाम मज़दूर यूनियन के नवीन ने कहा कि करावलनगर पुलिस थाने के पक्षपातपूर्ण व्यवहार और मज़दूरों की ओर से प्राथमिकी दर्ज़ न कराए जाने के कारण यूनियन सीधे पुलिस उपायुक्त, उत्तर-पूर्वी दिल्ली के पास शिकायत दर्ज़ कराएगी और अगर तब भी कार्रवाई नहीं होती है तो फिर हमारे पास अदालत जाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा। ग़ौरतलब है कि बादाम मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में पिछले एक वर्ष से बादाम मज़दूर अपने कानूनी हक़ों की माँग कर रहे हैं और साथ ही बादाम संसाधन उद्योग को सरकार द्वारा औपचारिक दर्ज़ा दिये जाने की माँग कर रहे हैं। फिलहाल, सभी बादाम गोदाम मालिक गैर-कानूनी ढंग से बिना किसी सरकारी लाईसेंस या मान्यता के ठेके पर मज़दूरों से अपने गोदामों में काम करवा रहे हैं। इसमें बड़े पैमाने पर महिला मज़दूर हैं लेकिन उनके लिए शौचालय या शिशु घर जैसी कोई सुविधा नहीं है। बादाम मज़दूरों को तेज़ाब में डाल कर सुखाए गए बादामों को हाथों, पैरों और दांतों से तोड़ना पड़ता है। उनके लिए सुरक्षा के कोई इंतज़ाम नहीं हैं और उन्हें टी.बी., खांसी, आदि जैसे रोग आम तौर पर होते रहते हैं। महिला मज़दूरों के बच्चे भी काफ़ी कम उम्र में ही जानलेवा बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। बादाम मज़दूर यूनियन इन मज़दूरों के लिए बेहतर कार्य स्थितियों की भी माँग कर रही है। लेकिन मालिक और ठेकेदार पुलिस प्रशासन और स्थानीय नेताओं और गुण्डों के बल पर अपनी मनमानी और गुण्डागर्दी चला रहे है। बादाम मज़दूर यूनियन के योगेश ने कहा कि लेकिन अब वे दिन लद गये हैं जब मज़दूर गुलामों की तरह चुपचाप खटते रहते थे और कोई आवाज़ नहीं उठाते थे। वे एक यूनियन के रूप में संगठित हो चुके हैं और अपने कानूनी हक़ों को जीतने से नीचे वे किसी जीत पर नहीं रुकेंगे।
बादाम मज़दूर यूनियन के आज रिहा हुए संयोजक आशीष कुमार सिंह ने कहा कि बादाम के ठेकेदार बुरी तरह से डर गये हैं। पुलिस को अपने साथ मिलाकर और गुण्डों के बल पर निहत्थे मज़दूरों पर कायराना हमला कराकर उन्होंने साबित कर दिया है कि वे झुण्ड में निहत्थे महिलाओं और बच्चों पर ही अपने पौरुष का प्रदर्शन कर सकते हैं। लेकिन महिला मज़दूरों ने उनके हमले का मुँहतोड़ जवाब देकर साबित कर दिया है कि वे ऐसे किसी भी नापाक हमले का जवाब उसी भाषा में दे सकते हैं। अब वे दिन गये जब मज़दूर चुपचाप मालिकों की मार और गाली-गलौच को बर्दाश्त करते थे। मज़दूर अपनी एकता के बल पर बिकी हुई पुलिस और मालिकों के गुण्डों, दोनों से टकराने की ताक़त रखते हैं। इस कायराना हमले ने मज़दूरों के हौसले को तोड़ने की बजाय उन्हें और बुलन्द कर दिया है। यह अकारण नहीं है कि करीब 15 फीसदी मज़दूर जो भय के कारण हड़ताल में शामिल नहीं थे, मज़दूर नेताओं की गिरफ्तारी के बाद वे भी हड़ताल में शामिल हो चुके हैं और उन्होंने मालिकों की मुनाफे की मशीनरी का चक्का पूरी तरह जाम कर दिया है।

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21.10.09

यू.पी. भवन पर प्रदर्शन में शामिल हों

गोरखपुर में पुलिस द्वारा मज़दूर आंदोलन के दमन के विरोध में

यू.पी. भवन पर प्रदर्शन में शामिल हों

21 अक्‍टूबर, 2009, सुबह 11 बजे

उत्तर प्रदेश भवन,

4, सरदार पटेल मार्ग, चाणक्‍यपुरी, दिल्‍ली


साथियो, हमने आपको गोरखपुर में मजदूर आंदोलन को कुचलने के लिए तीन युवा कार्यकर्ताओं को फर्जी मामलों में गिरफ्तार किए जाने की सूचना दी थी, इस मामले में 9 और मजदूरों पर झूठे मुकदमे दायर किए गए हैं। जिला प्रशासन और पुलिस, फैक्‍ट्री मालिकों के भाड़े के गुण्‍डों की तरह काम कर रहे हैं। जिला प्रशासन थैलीशाहों के पक्ष में बेशर्मी की हद पार कर चुका है। 15 अक्‍टूबर को बातचीत के बहाने एडीएम (सिटी) के कार्यालय में बुलाकर तीन वरिष्‍ठ प्रशासनिक अधिकारियों - एडीएम (सिटी), सिटी मजिस्‍ट्रेट और कैंट इंस्‍पेक्‍टर ने खुद इन श्रमिक नेताओं को बुरी तरह पीटा। उन्‍होंने दिल की गंभीर बीमारी से पीड़ि‍त एक युवा कार्यकर्ता तक को नहीं बख्‍शा और उनके साथियों के विरोध और अपील के बावजूद बर्बरता से उनकी पिटाई की गई।

इन सभी को 22 अक्‍टूबर तक जमानत देने से इंकार कर दिया गया है, और पुलिस ''गैंग्‍सटर एक्‍ट'' लगाकर उन्‍हें लंबे समय तक जेल में बंद रखने की योजना बना रही है। यही नहीं, पुलिस-प्रशासन-मालिक गठजोड़ इन युवा कार्यकर्ताओं को ''नक्‍सलवादी'' और ''आतंकवादी'' घोषित करने पर तुला हुआ है और उन्‍हें परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहने की धमकियां दी जा रही हैं।

मालिकों की शह पर पुलिसिया आतंकराज कायम कर दिया गया है।

मज़दूर आंदोलन पर इस हमले के विरोध में मज़दूरों, विभिन्‍न संगठनों के कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और छात्रों के प्रदर्शन में शामिल हों।


Satyam

99104 62009

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बिगुल के बारे में

बिगुल पुस्तिकाएं
1. कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन और उसका ढाँचा -- लेनिन

2. मकड़ा और मक्खी -- विल्हेल्म लीब्कनेख़्त

3. ट्रेडयूनियन काम के जनवादी तरीके -- सेर्गेई रोस्तोवस्की

4. मई दिवस का इतिहास -- अलेक्ज़ैण्डर ट्रैक्टनबर्ग

5. पेरिस कम्यून की अमर कहानी

6. बुझी नहीं है अक्टूबर क्रान्ति की मशाल

7. जंगलनामा : एक राजनीतिक समीक्षा -- डॉ. दर्शन खेड़ी

8. लाभकारी मूल्य, लागत मूल्य, मध्यम किसान और छोटे पैमाने के माल उत्पादन के बारे में मार्क्‍सवादी दृष्टिकोण : एक बहस

9. संशोधनवाद के बारे में

10. शिकागो के शहीद मज़दूर नेताओं की कहानी -- हावर्ड फास्ट

11. मज़दूर आन्दोलन में नयी शुरुआत के लिए

12. मज़दूर नायक, क्रान्तिकारी योद्धा

13. चोर, भ्रष्‍ट और विलासी नेताशाही

14. बोलते आंकड़े चीखती सच्‍चाइयां


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