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9.10.09

एक तरफ भूख और अकाल - दूसरी तरफ गोदामों में सड़ता अनाज यह है पूँजी की मुनाफाखोर व्यवस्था की सच्चाई...


एक तरफ देश के आधे से अधिक जिले भीषण सूखे और अकाल से जूझ रहे हैं, देशभर में करोड़ों लोग अनाज की बढ़ती क़ीमतों के कारण आधा पेट ख़ाकर गुज़ारा कर रहे हैं, दूसरी ओर सरकारी गोदामों में पड़ा लाखों टन अनाज सड़ रहा है।

कृषि मन्‍त्री शरद पवार ने संसद में बताया कि इस वर्ष अप्रैल-मई के महीनों के दौरान परिवहन और भण्डारण के दौरान 2.2 लाख टन गेहूँ और चावल सड़ गया। इस अनाज से 12 लाख लोगों का एक साल तक पेट भरा जा सकता था। विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तव में बर्बादी इससे भी ज्यादा की हुई होगी। पंजाब के तरनतारन ज़िले में 5300 टन गेहूँ खुले में पड़े-पड़े सड़ गया। अब यह गेहूँ जानवरों को खिलाने लायक भी नहीं रह गया है। जिस अनाज से 30,000 लोगों को एक साल तक खाना खिलाया जा सकता था, उसे अब खाद बनाने के लिए नीलाम कर दिया जायेगा! ये तो मात्र एक उदाहरण है। चण्डीगढ़ के पास खमाणू में गेहूँ की कई लाख बोरियाँ दो साल से खुले में पड़े-पड़े सड़ गयीं। पंजाब में कुल 155 लाख टन गेहूँ आज भी खुले में रखा हुआ है। तय है कि इसका भी अच्छा-खासा हिस्सा सड़ ही जायेगा।

दूसरे राज्यों का हाल भी ऐसा ही है। पश्चिम बंगाल में कुल 57,770 टन गेहूँ की सरकारी ख़रीद की गयी जिसका भारी हिस्सा खुले में पड़ा है। बिहार में गोदाम नहीं होने के कारण इस साल किसानों से 2 लाख टन धान खरीदा ही नहीं गया। उड़ीसा में 55 लाख टन अनाज की ख़रीद का लक्ष्य है लेकिन सिर्फ 7 लाख टन अनाज के भण्डारण का इन्तज़ाम है। नागरिक आपूर्ति विभाग के एक अफसर का कहना है कि उनका विभाग हर साल 1-2 प्रतिशत को ''बरबाद'' दिखा देता है, लेकिन वास्तव में बरबादी इससे बहुत ज्यादा होती है। यानी हर वर्ष 50 हज़ार से लेकर एक लाख टन अनाज की बरबादी। बिहार में हर साल 27 लाख टन अनाज की सरकारी ख़रीद होती है जिसमें से 5 प्रतिशत यानी करीब एक लाख पैंतीस हज़ार टन अनाज गोदामों में खराब हो जाता है। देश के दूसरे राज्यों में भी हर साल जितना अनाज बरबाद हो जाता है उससे लाखों लोगों का पेट भरा जा सकता है।

सवाल सिर्फ भण्डारण में कमी के कारण अनाज के सड़ जाने का ही नहीं है - हर साल गोदामों में लाखों टन अनाज चूहे खा जाते हैं। ज़ाहिर है, इन ''चूहों'' में सरकारी कर्मचारियों और अफसरों का भी अच्छा-खासा हिस्सा होता है जो इस अनाज को काले बाज़ार में बेच डालते हैं।

कुछ वर्ष पहले अर्थशास्‍त्री अमर्त्य सेन ने कहा था कि देश में अनाज का इतना अधिक भण्डार है कि अगर अनाज की बोरियों को एक के ऊपर एक रखा जाये तो उनकी ऊँचाई चाँद तक पहुँच जायेगी। लेकिन इस विशाल भण्डार के बावजूद देश में कई करोड़ लोग हर रात भूखे सोते हैं। आज भी देश के बहुत से इलाकों में भूख से तड़पकर लोगों की मौत हो जाती है। गोदामों में अनाज सड़ता रहता है, या उसे चूहे खाते रहते हैं और बाज़ार में अनाज की क़ीमतें आसमान पर पहुँच जाती हैं। ग़रीबों- मेहनतकशों की थाली से दालें तो ग़ायब ही हो चुकी हैं, रोटियाँ भी कम होती जा रही हैं। खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा बनायी गयी भूख से पीड़ित 88 देशों की सूची में भारत नीचे से 66वें स्थान पर है!

ऐसा घिनौना मज़ाक सिर्फ पूँजीवादी व्यवस्था में ही हो सकता है - जहाँ मुनाफे से बढ़कर कोई चीज़ नहीं है। गोदामों में पड़ा अनाज अगर बाज़ार में आ जायेगा, या पेट भरने के लिए ग़रीबों को दे दिया जायेगा, तो बाज़ार में आपूर्ति ज्यादा होने के कारण अनाज की कीमतें गिरने लगेंगी और मुनाफा कम हो जायेगा। मुनाफे पर टिकी व्यवस्था में यह गुनाह कैसे हो सकता है! इसलिए भूख से मरें तो मरें - बाज़ार व्यवस्था को गड़बड़ नहीं होना चाहिए।

मुनाफे का यह ख़तरनाक तर्क पूरी दुनिया में ऐसे ही काम करता है। सबसे ज्यादा अनाज पैदा करने वाले अमेरिका और आस्‍ट्रेलिया में हर साल लाखों टन अनाज सुअरों को खिला दिया जाता है जबकि अफ्रीका, एशिया और लातिनी अमेरिका के बहुत से देशों में भयानक भुखमरी फैली होती है। आज एक खेत से जितनी पैदावार हो सकती है, केवल उसके आधार पर हिसाब लगाया जाये, तो अकेले अमेरिका, कनाड़ा और ऑस्ट्रेलिया पूरी दुनिया का पेट भरने लायक अनाज पैदा कर सकते हैं। लेकिन वहाँ की सरकारें हर साल किसानों को करोड़ों डॉलर की सब्सिडी इसलिए देती हैं ताकि वे अपने खेत परती छोड़ दें। वजह वही मुनाफा - अगर पैदावार ज्यादा होगी तो बाज़ार में जिन्सों की कीमतें गिर जायेंगी और पूँजीपतियों के मुनाफे में कमी आ जायेगी।

मालों और उत्पादक शक्तियों की बरबादी पूँजीवाद के ज़िन्दा रहने की शर्त है। अभी ज्यादा समय नहीं हुआ जब बाज़ार में कीमतें बनाये रखने के लिए बड़े-बड़े जहाज़ों में भरकर अनाज समुद्र में गिरा दिया जाता था या जला दिया जाता था। अब बरबादी के नये-नये तरीके आ गये हैं और बरबादी का पैमाना भी ज्यादा बड़ा हो गया है। जिस व्यवस्था में करोड़ों लोग भूख से तड़पते हों, जहाँ हिन्दुस्तान जैसे देश में रोज़ 9 हज़ार बच्चे भूख, कुपोषण और उससे पैदा होने वाली बीमारियों से मर जाते हों और फिर भी लाखों टन अनाज पड़े-पड़े सड़ जाता हो, उस व्यवस्था को जितनी जल्दी हो तबाह कर दिया जाना चाहिए। पूँजीवाद की मौत देश के करोड़ों ग़रीब, मेहनतकश लोगों के जीने की शर्त है!!

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बिगुल के बारे में

बिगुल पुस्तिकाएं
1. कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन और उसका ढाँचा -- लेनिन

2. मकड़ा और मक्खी -- विल्हेल्म लीब्कनेख़्त

3. ट्रेडयूनियन काम के जनवादी तरीके -- सेर्गेई रोस्तोवस्की

4. मई दिवस का इतिहास -- अलेक्ज़ैण्डर ट्रैक्टनबर्ग

5. पेरिस कम्यून की अमर कहानी

6. बुझी नहीं है अक्टूबर क्रान्ति की मशाल

7. जंगलनामा : एक राजनीतिक समीक्षा -- डॉ. दर्शन खेड़ी

8. लाभकारी मूल्य, लागत मूल्य, मध्यम किसान और छोटे पैमाने के माल उत्पादन के बारे में मार्क्‍सवादी दृष्टिकोण : एक बहस

9. संशोधनवाद के बारे में

10. शिकागो के शहीद मज़दूर नेताओं की कहानी -- हावर्ड फास्ट

11. मज़दूर आन्दोलन में नयी शुरुआत के लिए

12. मज़दूर नायक, क्रान्तिकारी योद्धा

13. चोर, भ्रष्‍ट और विलासी नेताशाही

14. बोलते आंकड़े चीखती सच्‍चाइयां


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