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21.2.10

अतीत का निचोड़ सामने है और भविष्य की तस्वीर भी!

इक्कीसवीं शताब्दी की पहली दशाब्दी के समापन के अवसर पर

मेहनतकश साथियो! निर्णायक बनो!

अपना ऐतिहासिक मिशन पूरा करने के लिए आगे बढ़ो!
वर्ष 2009 के बीतने के साथ ही इक्कीसवीं सदी का पहला दशक बीत चुका है। विगत दस वर्षों के दौरान पूरी दुनिया के पैमाने पर जो घटनाएँ घटी हैं, उन्होंने हमें बीसवीं शताब्दी के गुज़रे हुए समय को समझने में तथा आने वाले दिनों की सम्भावनाओं को, भविष्य के दिशा संकेतों को पहचानने में कापफी मदद की है। भविष्य की सूत्राधार ताक़तें अभी इतिहास के रंगमंच पर सक्रिय नहीं हुई हैं, लेकिन उनके अवतरण की ज़मीन जितनी तेज़ी से तैयार हो रही है, उसे देखकर कहा जा सकता है कि गुज़री हुई दशाब्दी में इतिहास की गति काफ़ी तेज़ रही है।
याद करें पिछली शताब्दी के आख़िरी दशक के उन शुरुआती वर्षों को, जब पूरी दुनिया में बस एक ही शोर था। चारों ओर समाजवाद की पराजय और मार्क्‍सवाद की असफ़लता की बातें हो रही थीं। पूँजीवादी सिद्धान्तकारों से लेकर दौ कौड़ी के टकसाली कलमघसीटों तक  सभी बस एक ही राग अलाप रहे थे। हालाँकि सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में जो झण्डा धूल में गिरा था, वह नकली समाजवाद का झण्डा था। वहाँ समाजवादी नक़ाब वाली राजकीय पूँजीवादी सत्ताओं का पतन हुआ था और उनका स्थान पश्चिमी ढंग की, खुली निजी स्वामित्व और प्रतिर्स्पद्धा वाली पूँजीवादी व्यवस्थाओं ने लिया था (इन देशों में वास्तविक समाजवाद तो वस्तुत: 1955-56 में ख्रुश्‍चेव के सत्तासीन होते ही पराजित हो चुका था)। उस समय थोड़े से बिखरे हुए क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट इस सच्चाई को सामने रख रहे थे और यह भी कह रहे थे कि 1955-56 में रूस और पूर्वी यूरोप में तथा 1976 में चीन में समाजवाद की जो पराजय हुई है, वह अन्तिम नहीं है। यह महज़ पहली सर्वहारा क्रान्तियों की हार है जिसकी शिक्षाएँ इन क्रान्तियों के नये संस्करणों की पफैसलावुफन जीत की ज़मीन तैयार करेंगी। यह श्रम और पूँजी के बीच जारी विश्व ऐतिहासिक समर का मात्रा पहला चक्र है, अन्तिम नहीं। अतीत में भी निर्णायक ऐतिहासिक जीत से पहले विजेता वर्ग एकाधिक बार पराजित हुआ है। कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों ने तब समाजवाद के अन्तर्गत जारी वर्ग संघर्ष, पूँजीवादी पुनर्स्थापना के अन्तर्निहित ख़तरों और चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की शिक्षाओं के आधार पर भविष्य में इन ख़तरों से लड़ने के बारे में भी बार-बार बातें की थीं। वे यह भी बताते रहे कि पूँजीवाद जिन कारणों से अपने भीतर से समाजवाद के बीज और उसके वाहक वर्ग को (अपनी क़ब्र खोदने वाले वर्ग को) पैदा करता है, वे बुनियादी कारण अभी भी मौजूद हैं। पर उस समय चारों ओर ''अन्त-अन्त'' का शोर था  समाजवाद का अन्त, मार्क्‍सवाद का अन्त, इतिहास का अन्त, विचारधारा का अन्त। वामपन्थी बुद्धिजीवी भी दिग्भ्रमित थे। मज़दूर वर्ग निराश था। क्रान्तिकारी वाम का जो हिस्सा चीज़ों को किसी हद तक जान-समझ रहा था, वह काफ़ी शक्तिहीन और निष्प्रभावी था। अलग-अलग भाषा में ज्यादातर पूँजीवाद बुद्धिजीवी बस एक ही बात कर रहे थे  उदार पूँजीवादी जनवाद की पफैसलाकुन जीत की बात। उसके बाद पूरा एक दौर चला जब अख़बारों, किताबों और 'हिस्ट्री', 'डिस्कवरी' जैसे चैनलों पर दिखायी जाने वाली फ़िल्मों तक में बस रूस, चीन के समाजवादी दौर के बारे में, स्तालिन और माओ के बारे में तरह-तरह के घटिया कुत्सा-प्रचार किये जाते रहे तथा पश्चिमी पूँजीवादी समाज, संस्कृति, जीवनशैली और पूँजीवादी इतिहास को महिमामण्डित किया जाता रहा।
बीसवीं शताब्दी के आख़िरी दशक में पूँजीवादी विचारकों से लेकर कुछ किताबी मार्क्‍सवादियों तक ने यह कहना शुरू कर दिया था कि बाज़ार और वैश्विक लूट को लेकर साम्राज्यवादियों के बीच लगातार जारी होड़ (जो युद्धों को जन्म देती रहती है और जो युद्ध सर्वहारा क्रान्ति के लिए अनुकूल माहौल बनाते रहते हैं) अब समाप्त हो चुकी है और यह कि अमेरिकी चौधाराहट में अब एकधा्रुवीय विश्व अस्तित्व में आ चुका है। कहा जाने लगा कि आज के साम्राज्यवाद को फ्पूँजीवाद की चरम अवस्था'' और फ्सर्वहारा क्रान्ति की पूर्वबेला'' नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अपनी क्रियाविधि में बदलाव करके अपने संकटों से निजात पाते रहने का नया मैकेनिज्म इसने विकसित कर लिया है।
लेकिन नयी सदी शुरू होते-होते पूँजीवाद ख़ुशफ़हमियों पर आशंका के काले बादल मँडराने लगे। एशिया, अप्रफ़ीका और लातिन अमेरिका के जिन देशों ने साम्राज्यवादी महाप्रभुओं और आई.एम.एफ़.-विश्व बैंक-गैट/विश्व व्यापार संगठन के निर्देशों-नुस्ख़ों पर अमल करते हुए उदारीकरण- निजीकरण की नीतियों को लागू किया था, वहाँ पहले ही पैदा हो चुका गम्भीर आर्थिक संकट नयी सदी में विस्पफोटक रूप धारण करने लगा। तेज़ी से बढ़ती बेरोज़गारी, धानी-ग़रीब की खाई, छँटनी, मज़दूरों की सामाजिक सुरक्षा के क़ानूनी प्रावधानों की समाप्ति और रहे-सहे बुर्जुआ श्रम क़ानूनों को भी बेअसर किये जाने के चलते लोगों को यह बात समझ आने लगी कि नवउदारवाद वस्तुत: क्लासिकी पूँजीवादी नग्न-निरंकुश लूट-मार की फ़िर से वापसी है। बढ़ती महँगाई और खाद्यान्न संकट ने कई देशों में एक बार फ़िर खाद्य-दंगों का ख़तरा पैदा कर दिया। पूँजी निवेश के लिए देशी-विदेशी पूँजीपतियों को किसानों की ज़मीन कौड़ियों के मोल सौंपने और बहुमूल्य खनिजों की लूट के लिए जंगल-पहाड़ को तबाह करके वहाँ के मूल निवासियों को उजाड़ देने के चलते पूरी दुनिया में  करोड़ों लोग विस्थापित हो गये। पर्यावरण की भयंकर तबाही हुई। ब्राज़ील से लेकर भारत तक, नाइज़ीरिया से लेकर इण्डोनेशिया तक  सभी जगह, अल्पविकसित पूँजीवादी देशों की कमोबेश समान स्थिति थी। सूडान, सोमालिया से लेकर सब सहारा और कैरीबियन के कई देशों में तो फ्विफ़ल राज्य'' की स्थिति पैदा हो गयी। चीन और भारत जैसे जो देश ऊँची विकास दर के हवाले से तरक्वफी की ढोल बजा रहे हैं, वहाँ भी महँगाई, बेरोज़गारी और धानी-ग़रीब की तेज़ी से बढ़ती खाई समाज को ज्वालामुखी के दहाने की ओर धाकेल रही है। समृद्ध िके ऊपर से रिसकर नीचे पहुँचने के आर्थिक सिद्धान्त की असलियत को दावों के ठीक उलट हवफीक़त ने नंगा कर दिया है। पूँजी की मार से सालाना लाखों का विस्थापन और दो दशकों में दो लाख किसानों की आत्महत्या, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि सभी बुनियादी सुविधाओं से आम मेहनतकश आबादी का वंचित होते जाना, अकूत खनिज सम्पदा पूँजीपतियों को सौंपने के लिए जंगल-पहाड़ की तबाही और वहाँ के आदिवासियों के विरुद्ध युद्ध छेड़ने जैसी स्थिति, बेहिसाब राजनीतिक भ्रष्टाचार और काले धन का समानान्तर अर्थतन्‍त्र, अनुत्पादक जुआड़ी पूँजीतन्‍त्र का तेज़ पफैलाव, आदि-आदि... जिन सच्चाइयों के साक्षी हम भारत में हो रहे हैं, वही स्थिति चीन, अर्जेण्टीना, ब्राज़ील, मेक्सिको, द. अप्रफ़ीका, नाइजीरिया, मिस्र आदि तीसरी दुनिया के अगली कतार के सभी देशों की है। पूर्वी यूरोप के जिन देशों को उदार पूँजीवादी फ्स्वर्ग'' के सपने दिखाये गये थे, उनकी स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है। रूस तेल और गैस के भारी भण्डार की बदौलत अपने अर्थतन्‍त्र को अराजकता से निकालने के बाद साम्राज्यवादी होड़ में फ़िर से शामिल होने के लिए आतुर है, लेकिन देश के भीतर विषमता, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और महँगाई के चलते जनाक्रोश की स्थिति सुलगते ज्वालामुखी जैसी बनी हुई है। स्वयं अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों की जनता भी नवउदारवादी नीतियों के कोप-कहर से अछूती नहीं बची है।

आर्थिक संकट के विस्पफोट के जिस चरम-बिन्दु ने इक्कीसवीं सदी के पहले दशक का सर्वोपरि तौर पर चरित्रा-निर्धारण किया है वह है 2006 में अमेरिका से शुरू हुई भीषण मन्दी जिसने जल्दी ही पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया और, जिसे अब एक नयी महामन्दी निस्संकोच कहा जा सकता है। 1930 के दशक के बाद की यह सबसे बड़ी मन्दी है, जिसने अमेरिका से शुरू होकर पूरी दुनिया को अपने चपेट में ले लिया। अब तक, पूरब से पश्चिम और उत्तार से दक्षिण तक करोड़ों मज़दूर इस मन्दी में अपना रोज़गार खो चुके हैं, लाखों छोटे निवेशक दिवालिया हो चुके हैं, हज़ारों बैंक तबाह हो चुके हैं, बहुतेरे देशों की अर्थव्यवस्थाएँ असमाधोयता के संकट के भँवर में पफँसी हैं या पफँसने के क़रीब हैं। तीसरी दुनिया के देशों की तो बात ही क्या, ग्रीस, स्पेन, इटली, पुर्तगाल जैसे कई यूरोपीय देशों में भी खाद्यान्न दंगे हो रहे हैं। पूरी दुनिया में पिछले दो दशकों के दौर में बेरोज़गारी और धानी-ग़रीब का अन्तर अभूतपूर्व रफ़्रतार से बढ़े हैं। अमेरिका और फ़िर अधिकांश पूँजीवादी देशों की सरकारों ने सरकारी ख़ज़ाने से (जो जनता का पैसा है) अरबों-खरबों डॉलर की सहायता (फ्प्रोत्साहन पैकेजय्ध्द कारख़ानेदारों-बैंकरों को देकर मन्दी के भूत से पीछा छुड़ाने की कोशिश की। इससे हालत में जो सुधार आये हैं (ग़ौरतलब है कि यह सुधार वास्तविक उत्पादक निवेश से नहीं, बल्कि सरकारी प्रोत्साहन-पैकेजों से आया है) उसे भी पूँजीवादी अर्थशास्त्राी तक अस्थायी राहत बता रहे हैं और कुछ तो इसे नकली रिकवरी तक बता रहे हैं। कुछ की भविष्यवाणी है कि इस वर्ष या अगले वर्ष तक, विश्व पूँजीवाद को मन्दी की एक और तगड़ी मार झेलनी पड़ सकती है।
पीछे मुड़कर कई दशकों की वैश्विक आर्थिक विकास दरों को देखने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि बीच के कुछ वर्षों की आंशिक रूप से बेहतर स्थिति के बावजूद, विकास दरों में गिरावट की रुझान कमोबेश 1970 के दशक से जारी है। 1987 में अमेरिकी अर्थतन्‍त्र को महाधवंस (ग्रेट क्रैश) का जो झटका लगा, उसे रीगनॉमिक्स एक हद तक ही सँभाल पाया था। 1990 के दशक में पूर्व सोवियत संघ के घटक देशों, पूर्वी यूरोप और चीन के बाज़ारों का खुलना भी विश्व पूँजीवाद को कोई विशेष राहत नहीं दे पाया। 1997 के दक्षिण एशियाई संकट के बाद से अबतक विश्व पूँजीवाद पाँच बड़े संकटों का सामना कर चुका है। नयी सदी का पहला दशक सतत् मन्दी का दशक रहा है। महाबली अमेरिका पहले 'डॉट कॉम क्रैश', फ़िर हाउसिंग बुलबुले के फ़टने का शिकार हुआ और फ़िर सबप्राइम संकट शुरू हुआ जिसने पूरी दुनिया को अपने चपेट में ले लिया। कहा जा सकता है कि विगत चार दशकों से ही विश्व पूँजीवादी अर्थतन्‍त्र एक मन्द मन्दी की सतत् प्रक्रिया से गुज़रता रहा है। बीच-बीच में राहत के कुछ संकेत मिलते हैं, फ़िर गति मद्धम पड़ जाती है और फ़िर ऐसे दौर आते हैं जब संकट विस्पफोटक रूप धार लेते हैं। इस प्रक्रिया का चरम दौर 2006 से शुरू हुए विश्वव्यापी आर्थिक  संकट और विकट मन्दी का दौर है। अब यह बात विश्वासपूर्वक कही जा सकती है कि विश्व पूँजीवाद का वर्तमान संकट, पहले के, आवर्ती चक्रीय क्रम में आने वाले संकटों से भिन्न, एक ढाँचागत संकट है, जो लगातार जारी है और बीच-बीच में विस्पफोटक रूप ले लेता है। यह विश्व पूँजीवाद का अन्तकारी रोग है। इतिहास ने बुद्धिजीवियों के तमाम मर्सियों को झुठलाते हुए मानव-मुक्ति की समाजवादी परियोजना की सार्थकता और उसके नवीकरण की ज़रूरत को एक बार फ़िर साबित किया है। इसने सिद्ध किया है कि तमाम बदलावों के बावजूद, साम्राज्यवादी बुढ़ापे को पूँजीवाद नौजवानी में नहीं बदल सकता। साम्राज्यवाद ही पूँजीवाद की चरम अवस्था है। अब यदि साम्राज्यवाद इतिहास की छाती पर बोझ की तरह, अपनी जड़ता की ताक़त से जमा हुआ है तो सिपर्फ इसलिए कि सर्वहारा वर्ग अभी अपने ऐतिहासिक मिशन को अंजाम देने के लिए तैयार नहीं हो पाया है। लेकिन यह तो सिपर्फ समय की बात है। सर्वहारा वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय के सामने इतिहास की शिक्षाएँ हैं, विगत प्रयोगों के सकारात्मक-नकारात्मक अनुभव हैं, जो उसे इक्कीसवीं शताब्दियों की नयी क्रान्तियों की राह दिखा रहे हैं। यही वजह है कि पूँजीवादी विश्व को आज कम्युनिज्म का हौवा फ़िर नये सिरे से सता रहा है। वह अपनी तमाम वैचारिक ताक़त लगाकर और मीडिया को सन्नद्ध करके वैज्ञानिक समाजवाद के विचारों पर, सर्वहारा क्रान्तियों पर और उनके महान नेताओं पर हमले बोल रहा है, झूठे घिनौने प्रचारों और मिथ्याभासी तर्कों का घटाटोप रच रहा है, लेकिन आज के पूँजीवादी विश्व की मानवद्रोही कुरुपताएँ-विभीषिकाएँ आम लोगों को समाजवादी स्वप्न और परियोजना के पुनर्जीवन के लिए सतत् प्रेरित कर रही हैं।

पूँजीवाद के अमरत्व के साथ दावे यह भी किये जा रहे थे कि अब अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्‍पर्द्धा तथा शीत युद्धों-उष्ण युद्धों का दौर समाप्त हो चुका है और अमेरिकी नेतृत्व में  एक-ध्रुवीय विश्व का निर्माण हो चुका है। गुज़रे दशक ने इस आकलन को ग़लत सिद्ध किया है। दुनिया का सबसे बड़ा कर्ज़दार मुल्क होने के बावजूद अमेरिकी चौधाराहट का मुख्य कारण डॉलर की विश्व मुद्रा जैसी स्थिति है। विश्व-व्यापार ज्यादातर डॉलर में ही होता है और लगभग सभी देश अपने विदेशी मुद्रा भण्डार का पूरा या बड़ा हिस्सा डॉलर के रूप में ही रखते हैं, अत: डॉलर के डाँवाडोल होने पर सभी अर्थव्यवस्थाएँ डगमगा जाती हैं। लेकिन यह स्थिति चिरस्थायी नहीं है। कई देश अपने विदेशी मुद्रा भण्डारों को 'डाइवर्सिफ़ाई' करने (यानी कई मुद्राओं में विदेशी मुद्रा भण्डार रखने) की शुरुआत कर चुके हैं। नये-नये साम्राज्यवादी गुट, धुरी और समीकरण उभर रहे हैं। इनमें पश्चिमी देशों के साथ-साथ, रूस और चीन भी प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं तथा भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अप्रफ़ीका जैसे नये पूँजीवादी देश भी छुटभैयों के रूप में प्रभावी बन रहे हैं।
आर्थिक दायरों की ये सरगर्मियाँ नयी धुरियों के निर्माण और अन्तर- साम्राज्यवादी होड़ के नये दौर की शुरुआत का स्पष्ट संकेत दे रही हैं। इनकी राजनीतिक अभिव्यक्तियाँ भी आनी शुरू हो चुकी हैं। जॉर्जिया, चेचेन्या और पूर्व युगोस्लाविया में ही नहीं, तीसरी दुनिया में मधयपूर्व से अप्रफ़ीका तक  सभी जगह के राजनीतिक-सामरिक टकरावों में एक अन्तरविरोध यदि साम्राज्यवाद और उन देशों की जनता के बीच का है, तो सतह के नीचे दूसरा अन्तरविरोध साम्राज्यवादी ताक़तों के बीच का भी है। इराक़ और अफ़गानिस्तान में जो साम्राज्यवादी ताक़तें अमेरिका का साथ दे रही हैं, वे इन देशों में उलझाव से अमेरिका के बढ़ते आर्थिक संकट से खुश भी हैं, क्योंकि इससे भविष्य में अमेरिकी चौधाराहट को प्रभावी चुनौती पेश करने में उन्हें मदद मिलेगी। रूस नये गुट का निर्माण करते हुए और दस वर्षों में अपने तेल-गेस आधारित अर्थतन्‍त्र को तकनोलॉजी- आधारित अर्थतन्‍त्र बनाने की योजना पर काम करते हुए नयी आक्रामकता के साथ प्रतिर्स्पद्धा में उतरा है, जिसकी सामरिक अभिव्यक्तियाँ भी नयी सैन्य तैयारियों और अमेरिका से नये सिरे से सामरिक अस्त्राों की होड़ के रूप में सामने आ रही हैं। शीतयुद्ध के एक नये दौर के आग़ाज़ के संकेत फ़िर से से मिलने लगे हैं।

अमेरिका की अजेय सैन्य शक्तिमत्ता के मिथक का धवस्त होना पिछले दशक की एक और प्रमुख प्रवृत्तिामूलक घटना रही है। जनसंहार के हथियारों और अलक़ायदा नेटवर्क को मदद पहुँचाने का आरोप लगाते हुए, इराक़ पर हमला करके उसकी अकूत तेल-सम्पदा पर कब्ज़ा करने के लिए उसने जो युद्ध छेड़ा, वह अपने मक़सद में पूरी तरह से नाक़ामयाब रहा। इरावफी प्रतिरोधी दस्तों की छापामार कार्रवाइयों के चलते तेल निकालकर मुनाफ़ा कूटने के सपने धारे के धारे रह गये। उल्टे युद्ध के भारी ख़र्च ने अमेरिकी अर्थतन्‍त्र पर गम्भीर प्रभाव डाला। इराक से अमेरिकी हवाई अड्डों पर लगातार उतरते ताबूत और लौटते हुए घायल सैनिकों ने अमेरिकी जनसमुदाय में युद्ध-विरोधी व्यापक लहर पैदा कर दी है। जो यूरोपीय देश तेल की बन्दरबाँट की शर्त पर इराक़ में अमेरिका का साथ दे रहे थे, उन्होंने मामला उल्टा पड़ते देख हाथ पीछे खींच लिया और अमेरिकी पराजय का इन्तज़ार करने लगे। अमेरिका की रणनीतिक हार तो वास्तव में हो चुकी है। अब वह किसी तरह से बाहर निकलने के रास्ते ढूँढ़ रहा है। अफ़गानिस्तान में भी वह इतनी ही बुरी तरह पफँस चुका है। अमेरिका और ब्रिटेन के कई जनरल स्वीकार कर चुके हैं कि यह लड़ाई जीती नहीं जा सकती।
उधार, फ़िलिस्तीनी जनता का प्रतिरोधा-संघर्ष पी.एल.ए. नेतृत्व की ग़द्दारी के बाद भी जारी है और अप्रतिरोधय बना हुआ है। अमेरिकी समर्थन से जिस इड्डायल ने 1967 में कई अरब देशों को एक साथ शिकस्त दी थी, उसकी सेना को लेबनान में हिज़बुल्ला के लड़ाकों ने पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया।
मधय-पूर्व और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी उलझाव का एक नतीज़ा यह सामने आया है कि उसके ऐन पिछवाड़े, लातिन अमेरिका से उसे चुनौती मिलने लगी है। पहले लातिन अमेरिकी देशों में थोड़ी भी राजनीतिक आज़ादी दिखाने वाली सत्ता के विरुद्ध अमेरिका द्वारा सैनिक विद्रोह कराकर किसी कठपुतली तानाशाह को बैठा देना आम बात होती थी। अब वेनेज़ुएला और बोलीविया जैसे देश क्यूबा के साथ मिलकर गुट बनाकर अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध जमकर आवाज़ उठा रहे हैं। ह्यूगो शावेज़ और इवो मोरालेस की सत्ताएँ निश्चय ही समाजवादी सत्ताएँ नहीं हैं, लेकिन अमेरिका-विरोधी गहरी घृणा के चलते व्यापक जनसमर्थन उनके साथ है और ये सत्ताएँ कुछ रैडिकल किस्म की जनकल्याणकारी नीतियों को लागू करते हुए नवउदारवादी भूमण्डलीय प्रोजेक्ट को भी चुनौती दे रही हैं। अन्य  लातिनी देश जो इतने रैडिकल नहीं हैं, वहाँ की बुर्जुआ या सामाजिक जनवादी सत्ताएँ भी अपनी राजनीतिक आज़ादी का खुलकर प्रदर्शन कर रही हैं। कुछ छोटे-छोटे मधय अमेरिकी देशों को छोड़कर लातिनी अमेरिका में सैनिक जुण्टाओं और कठपुतली सरकारों का दौर समाप्त हो चुका है।

नयी सदी के गुज़रे दशक में एक और महत्तवपूर्ण राजनीतिक परिघटना देखने में आई है। एशिया और अप्रफ़ीका के बहुतेरे देशों में राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में साम्राज्यवाद-विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष क्रान्तिकारी ढंग से चले थे, लेकिन सत्तासीन होने के बाद वहाँ के बुर्जुआ वर्ग ने पूँजीवादी नीतियों को लागू करते हुए साम्राज्यवाद के साथ समझौते का रास्ता चुना था। लगभग इन सभी शासकों ने 1990 के दशक में नवउदारवादी नीतियों पर अमल की शुरुआत की। इन सभी देशों में बुर्जुआ शासन ज्यादा से ज्यादा भ्रष्ट और निरंकुश होता चला गया है तथा बुर्जुआ जनवाद का तेज़ी से क्षरण-विघटन हुआ है। अब इनमें से कई देशों की जनता नवउदारवादी नीतियों का विरोध करती हुई, साम्राज्यवाद के साथ-साथ देशी बुर्जुआ वर्ग का भी जमकर विरोध कर रही है। यह स्थिति केन्या, द. अप्रफ़ीका और ज़िम्बाब्वे आदि कई अप्रफ़ीकी देशों से लेकर ईरान तक में है, जहाँ की जनता अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ-साथ अब अहमदीनेजाद की निरंकुश सत्ता का भी पुरज़ोर विरोध कर रही है। ये परिस्थितियाँ इक्कीसवीं सदी की उन नयी क्रान्तियों की वर्ग-लामबन्दी को दर्शा रही हैं, जिनका चरित्रा मूलत: साम्राज्यवाद विरोधी पूँजीवाद विरोधी क्रान्ति का होगा। बीसवीं शताब्दी के उत्तारर्ाद्ध तक में, अधिकांश उत्तार- औपनिवेशिक समाजों में राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के कार्यभार मुख्यत: छूटे  हुए थे। अब आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ बताती हैं कि मुख्यत: वे पूरे हो चुके हैं, पहली बार उत्तार- औपनिवेशिक समाजों में पूँजी और श्रम के बीच का अन्तरविरोध प्रधान बनकर सामने आया है और एक नये प्रकार की समाजवादी क्रान्ति की ज़मीन तैयार हुई है। इक्कीसवीं सदी की विश्व सर्वहारा क्रान्ति की नयी आम लाइन इन परिस्थितियों के सांगोपांग अधययन के बाद ही तैयार की जा सकती है।

रूस में, उक्रेन में और पूर्व सोवियत संघ के कई घटक देशों में नवउदारवादी नीतियों और भ्रष्ट निरंकुश सत्ताओं के विरुद्ध जनाक्रोश गहराता जा रहा है। महत्तवपूर्ण बात यह है कि इनमें से कई देशों में (संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टियों से अलग) कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन मौजूद हैं जो स्तालिन तक की विरासत को स्वीकार करते हैं और ख्रुश्चेवी संशोधनवाद को ख़ारिज करते हैं। चीन में फ्बाज़ार समाजवाद'' के विरुद्ध किसानों-मज़दूरों के स्वत:स्पफूर्त विद्रोहों के अनवरत सिलसिले की ख़बरें तो 1990 के दशक से ही लगातार आती रही हैं। इधार ऐसी सूचनाएँ भी छनकर बाहर आयी हैं कि वहाँ माओ और सांस्कृतिक क्रान्ति की विरासत को मानने वाले माओवादी ग्रुप भी जगह- जगह जनता के बीच सक्रिय हैं। पूँजीवादी पथगामियों की असलियत नंगी होने के साथ-साथ नयी पीढ़ी  तक में माओ और सांस्कृतिक क्रान्ति के दौर के बारे में उत्सुकता पैदा हुई है। इन समाजवादी देशों की जनता समाजवादी प्रयोगों की साक्षी रह चुकी है। अब पूँजीवादी  लूटमार-भ्रष्टाचार-दमन का नज़ारा उनके सामने है। बढ़ते संकट और गहराते अन्तरविरोधों के साथ इन देशों में अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण के पुनर्निर्माण की ज़मीन तैयार होने लगी है।

कार्ल मार्क्‍स ने डेढ़ सौ वर्ष पहले कहा था कि पूँजीवाद मुनापफे की अंधी हवस में मनुष्य के साथ ही प्रकृति को भी निचोड़कर तबाह कर रहा है। गत शताब्दी के आख़िरी तीन दशकों के दौरान पर्यावरण की तबाही  कारख़ानों से नदियों के प्रदूषण, पूँजीवादी खेती में जहरीले कीटनाशकों-रसायनों के अन्धााधुन्धा इस्तेमाल से मिट्टी और भूमिगत जल की तबाही, स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गम्भीर प्रभावों, जंगलों की कटाई, रेगिस्तानों के विस्तार, इंसानी कारणों से बाढ़ व सूखे की बढ़ोत्तारी, ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियरों के पिघलने, ओज़ोन परत में छेद होने से घातक विकिरण के ख़तरों आदि पर लगातार चर्चा होती रही। कुछ ऐसे भी लोग थे, जो तकनीक एवं उद्योगों को ही विनाश का कारण मानते हुए पीछे की ओर लौटने का नारा दे रहे थे। कुछ पर्यावरणवादी इसी व्यवस्था में पर्यावण-विनाश की समस्या का समाधान ढूँढ़ते हुए सरकारों से अपील कर रहे थे, तो कुछ जनता से नदियों की सफ़ाई, ऊर्जा की बचत, ऑर्गेनिक खेती की अपील कर रहे थे। फ़िर मुख्यत: गत शताब्दी के अन्तिम दशक के दौरान, कई पुस्तकों और निबन्धाों ने विस्तृत तथ्यों और तर्कों के आधार पर यह प्रमाणित किया कि पर्यावरण के भयंकर विनाश का बुनियादी कारण पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली है। पूँजीवाद कोई एकाश्मी व्यवस्था नहीं है। कच्चे मालों का अन्धााधुन्धा दोहन करते हुए, मुनाफ़ा कूटने के लिए बिना सामाजिक ज़रूरत के बेशुमार कारों और विलासिता के अनगिन सामानों का उत्पादन करते हुए, भूमिगत जल निकालते हुए, मिट्टी में ज़हरीले रसायन झोंकते हुए, नदियाँ ज़हरीली बनाते हुए, एक-दूसरे से गलाकाटू प्रतिर्स्पद्धा करते पूँजीपति ओज़ोन लेयर के छेद के बारे में, ग्लोबल वार्मिंग के बारे में, भविष्य में पृथ्वी के मनुष्य के नहीं रहने लायक़ बन जाने के बारे में एक साथ मिलकर नहीं सोच सकते। जो सोचेगा, वह दौड़ से बाहर हो जायेगा। पूँजीपति सिपर्फ अपने आज के मुनापफे की सोचता है और ठीक नाक के आगे देखता है। उनमें कभी किसी प्रश्न पर आम सहमति नहीं बन पाती। पूँजीवादी व्यवस्था के दूरगामी हित के बारे में सोचने वाले नेता और थिंक टैंक ज़रूर कुछ 'डैमेज कण्ट्रोल' के क़दमों की बात करते हैं, पर पूँजीवाद के रहते अब महज़ कुछ 'डैमेज कण्ट्रोल' के क़दमों से पर्यावरण को नहीं बचाया जा सकता। पिछले दशक में पर्यावरण- विनाश के जो तथ्य सामने आये हैं, उन्होंने साबित कर दिया है कि पूँजीवाद के रहते पर्यावरण की तबाही को रोक पाना मुमकिन नहीं है। कोपेनहेगन सम्मेलन की विफ़लता ने भी इस सच्चाई पर ही ठप्पा लगाया है। उपाय सिपर्फ यह है कि मुनापफे के लिए अन्धाधुन्ध अराजक उत्पादन और अन्धाधुन्ध मुनाफ़े की अन्धी होड़ की व्यवस्था को ही समाप्त कर दिया जाये। यानी उत्पादन मुनापफे के लिए न हो, नियोजित ढंग से सामाजिक आवश्यकताओं के लिए हो। यह तभी हो सकता है जब उत्पादन के साधानों के निजी मालिकाने को समाप्त कर दिया जाये और उत्पादन एवं विनिमय की समाजीकृत प्रणाली क़ायम की जाये, जिसपर आम जनसमुदाय का नियन्त्राण हो। तब तकनीक के सहारे समाज प्रकृति प्रदत्त चीज़ों से उपयोग लायक़ चीज़ें बनायेगा और इस प्रक्रिया में प्रकृति में यदि कोई असन्तुलन पैदा होगा तो तकनीक के सहारे ही उसे दुरुस्त करने का भी काम करेगा। सीधो-सादे शब्दों में कहा जा सकता है कि पर्यावरण को पूँजीवाद तबाह कर रहा है और दुनिया को बचाने का एकमात्र रास्ता यही है कि जनक्रान्तियों के द्वारा पूँजीवाद को तबाह करके समाजवादी मुक्ति-परियोजनाओं को अमली जामा पहनाया जाये।

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पिछली शताब्दी के अन्तिम दशक में जब उदारीकरण-निजीकरण मुहिम के नतीजों के ख़िलाफ़ पश्चिमी देशों का मज़दूर आत्मरक्षात्मक ढंग से उठ खड़ा हुआ और पुराने ट्रेड-यूनियन आन्दोलन में एक बार फ़िर कुछ प्राण संचार होता दीखा तो कुछ वाम बुद्धिजीवियों को इससे काफ़ी उम्मीदें दीखने लगीं। लेकिन गुज़रे दशक ने एक बार फ़िर सिद्ध किया है कि ट्रेड यूनियन के आर्थिक संघर्षों से मज़दूर महज़ आत्मरक्षा कर सकता है और कुछ रियायतें हासिल कर सकता है। पूँजीवाद का नाश करके समाजवाद का निर्माण करने के लिए उसे राजनीतिक संघर्ष करते हुए राज्यसत्ता दख़ल की दिशा में आगे बढ़ना होगा और यह तभी हो सकता है जब सर्वहारा वर्ग की एक ऐसी क्रान्तिकारी पार्टी हो, जो सही कार्यक्रम और वर्ग लामबन्दी की सही समझ से  लैस हो।
कुछ ऐसे भी बुद्धिजीवी थे जो चियापास (मेक्सिको) के किसान संघर्ष, विभिन्न जनान्दोलनों और छिटपुट स्वयंस्पूफर्त संघर्षों को ही एकमात्रा विकल्प के रूप में देखने लगे थे। इस ''उत्तार-आधुनिक'' स्वत:स्पूफर्ततावाद और लोकरंजकतावाद का गुब्बारा भी अब पिचक चुका है। अभी भी कुछ ऐसे हैं जो वेनेज़ुएला या क्यूबा को समाजवाद के मॉडल के रूप में देखते हैं। पर इन मिथ्या आशाओं के धवस्त होने में अब ज्यादा समय नहीं लगेगा।
गुज़रे दशक के आधुनिक इतिहास ने सार्वकालिक-सार्वभौमिक महत्तव की इस शिक्षा को एक बार फ़िर पुष्ट किया है कि सर्वहारा वर्ग ही एकमात्रा वह वर्ग है, जिसके नेतृत्व में अन्य मेहनतकश जनसमुदाय लामबन्द होकर पूँजीवाद के युग को अवसान तक लेकर जायेंगे। सर्वहारा वर्ग का यह ऐतिहासिक मिशन है। वही पूँजीवाद की क़ब्र खोदने वाला वर्ग है। लेकिन जबतक किसी देश में मार्क्‍सवाद के क्रान्तिकारी विज्ञान और क्रान्ति के कार्यक्रम की सही समझ के आधार पर एक क्रान्तिकारी सर्वहारा पार्टी नहीं बनेगी, तबतक सारे उग्र संघर्ष कालान्तर में दिशाहीन होकर भटकते रहेंगे और पूँजीवाद अपनी जड़ता की ताक़त और दमनतन्‍त्र के सहारे टिका रहेगा।
वर्तमान समय ने बदली हुई सच्चाइयों की तस्वीर एकदम साफ़ कर दी है और स्पष्ट कर दिया है कि इक्कीसवीं सदी की सर्वहारा क्रान्तियाँ, बीसवीं सदी की सर्वहारा क्रान्तियों से बहुत कुछ सीखते हुए भी उनका अन्धाानुकरण नहीं करेंगी। जैसे, भारत जैसे अधिकांश उत्तार-औपनिवेशिक समाजों में सामन्तवाद विरोधी कार्यभार अब मुख्यत: समाप्त हो चुके हैं। अत: इन देशों में साम्राज्यवाद विरोधी, पूँजीवाद-विरोधी नये प्रकार की सर्वहारा क्रान्ति की स्थितियाँ परिपक्व हो चुकी हैं। यही नहीं, पूँजीवाद की कार्यप्रणाली के बदलावों के चलते भी भावी क्रान्तियों की रणनीति एवं आम रणकौशल में कुछ बदलाव की स्थितियाँ पैदा हुई हैं। समस्या यह है कि वैचारिक तौर पर कमज़ोर, बिखरी हुई क्रान्तिकारी ताक़तों में विगत क्रान्तियों के अन्धानुकरण की कठमुल्लावादी प्रवृत्ति गहराई तक जड़ जमाये हुए है। यह एक बहुत बड़ी गाँठ है, जिसे खोलना ही होगा।

कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक ने एक बार फ़िर स्पष्ट संकेत दिये हैं कि यह शताब्दी निर्णायक सर्वहारा क्रान्तियों की सदी होगी। आने वाले दिन तूफ़ानी उथल-पुथल भरे दिन होंगे। साम्राज्यवादी दुनिया को कम्युनिज्म का भूत फ़िर से सताने लगा है। बुर्जुआ राज्यसत्ताएँ अपने दमनतन्‍त्र को चाक-चौबन्द करने लगी हैं।
लेकिन भविष्य में निर्णायक सर्वहारा क्रान्तियों के होने और उनकी विजय के बारे में एकदम नियतिवादी तरीके से बात नहीं कही जा सकती। यदि सर्वहारा क्रान्ति की नेतृत्वकारी ताक़तें अतीत की क्रान्तियों, वर्तमान के स्वत:स्पूफर्त संघर्षों और सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक उपादानों का सही-सटीक अधययन- विश्लेषण करके नतीजे नहीं निकालेंगी तो लाख संकटों के बावजूद पूँजीवादी व्यवस्था अपनेआप क़ब्र में जाकर नहीं लेट जायेगी। मेहनतकश जनसमुदाय को क्रान्ति न कर पाने की सज़ा बर्बरतम फ़ासिस्ट तानाशाही के रूप में मिलेगी और कालान्तर में पूँजीवाद मानव सभयता को ही विनाश के मुक़ाम तक पहुँचायेगा। विकल्प मात्रा दो ही हैं  समाजवाद या विनाश! अब मज़दूर वर्ग को तय करना है कि वह कौन-सा विकल्प चुने और अपने बलिष्ठ हाथों से इतिहास को मानव-मुक्ति की दिशा में मोड़े, या निष्क्रिय-अकर्मण्य बैठा विनाश की प्रतीक्षा करे।

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21.6.09

फासीवाद क्या है और इससे कैसे लड़ें

- अभिनव

जनवादियों और यहाँ तक कि क्रान्तिकारियों का एक हिस्सा इस बात को लेकर बेहद ख़ुश है कि भारतीय जनता पार्टी के रूप में साम्प्रदायिक फासीवाद की पराजय हुई है और फासीवादी ख़तरा टल गया है। चुनावों के ठीक पहले कई सर्वेक्षण इस बात की ओर इशारा कर रहे थे कि चुनावी नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं और आडवाणी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्‍धन को भी विजय हासिल हो सकती है, या कम-से-कम उसे संयुक्त प्रगतिशील गठबन्‍धन के बराबर या उन्नीस-बीस के फर्क से थोड़ी ज्यादा या थोड़ी कम सीटें मिल सकती हैं। चुनाव के नतीजों ने इस बात को ग़लत साबित किया और कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्‍धन को विजय प्राप्त हुई। चुनावी नतीजों के हिसाब से चला जाये तो भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा है और पराजय के बाद भाजपा में टूट-फूट, बिखराव और आन्तरिक कलह का एक दौर शुरू हो गया है। भाजपा के शीर्ष विचारकों में से एक सुधीन्द्र कुलकर्णी ने हार का ठीकरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रणनीति पर फोड़ते हुए काफी हंगामा खड़ा कर दिया। जसवन्त सिंह ने कहा है कि चुनाव में पराजय के कारणों पर भाजपा में खुली बहस होनी चाहिए। भाजपा नेताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह को काफी खरी-खोटी सुना रहा है और राजनाथ सिंह की स्थिति काफी दयनीय हो गयी है।

इस सारे घटनाक्रम को देखकर निश्चित तौर पर सन्तोष और ख़ुशी का अनुभव होता है। लेकिन क्या इन चुनावी नतीजों और उसके बाद भाजपा में मची उठा-पटक को देखकर यह कहना उचित है कि फासीवाद भारत में उतार पर है? क्या यह नतीजा निकालना सही है कि भाजपा की पराजय भारत में फासीवाद की पराजय है? इस प्रश्न का जवाब देने के लिए हमें यह समझना होगा कि फासीवाद आख़िर है क्या? इसका इतिहास क्या है? यह कैसे पैदा हुआ? विभिन्न देशों में इसने क्या-क्या रूप ग्रहण किये? इन प्रश्नों के जवाब देने के बाद ही हम यह तय करने की स्थिति में होंगे कि भारत में फासीवाद की ''नियति'' क्या है।

इससे पहले कि हम फासीवाद के इतिहास और उसके अर्थ पर जायें, कुछ और मुद्दों पर एक शुरुआती चर्चा करना ज़रूरी है। इस चर्चा के बाद हम फासीवाद के विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए एक बेहतर स्थिति में होंगे। यह चर्चा पूँजीवाद की प्रकृति, उसके स्वाभाविक संकट और उसकी सम्भावित परिणतियों पर है।

पूँजीवाद की स्वाभाविक परिणतियाँ पूँजीवादी-व्यवस्था किस प्रकार अपनी स्वाभाविक गति से संकट की ओर जाती है

हम एक पूँजीवादी व्यवस्था और समाज में जी रहे हैं। इसकी चारित्रिक विशेषताएँ क्या हैं? यह निजी मालिकाने पर आधारित एक व्यवस्था है जिसके केन्द्र में निजी मालिक का मुनाफा है। निजी मालिकों का पूरा वर्ग आपस में प्रतिस्पर्द्धा करता है और इस प्रतिस्पर्द्धा का मैदान होता है पूँजीवादी बाज़ार। समाज के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताओं का कोई विस्तृत मूल्यांकन और अनुमान नहीं लगाया जाता है। बाज़ार में माँग के परिमाण के एक मोटा-मोटी मूल्यांकन के आधार पर पूँजीपति यह तय करता है कि उसे क्या पैदा करना है और कितना पैदा करना है। लेकिन यह मूल्यांकन पूरा पूँजीपति वर्ग मिलकर नहीं करता है बल्कि अलग-अलग निजी पूँजीपति करते हैं और इसके आधार पर वे प्रतिस्पर्द्धा करने बाज़ार में उतरते हैं। इसलिए पूरे समाज में होने वाला उत्पादन योजनाबद्ध तरीके से नहीं होता है बल्कि अराजक तरीके से होता है। बाज़ार द्वारा बतायी जाने वाली माँग और आपूर्ति की स्थितियों के अनुसार हर पूँजीपति उत्पादन-सम्बन्‍धी निर्णय लेता है। बाज़ार में कई सेक्टर मौजूद होते हैं। इन सभी सेक्टरों को मोटे तौर पर दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है उपभोग की वस्तुओं का उत्पादन और उत्पादन के साधनों का उत्पादन। उपभोग की वस्तुओं में आदमी की रोज़मर्रा की जीवन आवश्यकताओं की विभिन्न वस्तुएँ होती हैं, मिसाल के तौर पर, खाने-पहनने के सामान, फ्रिज-टी.वी.-वाहनों आदि जैसी उपभोक्ता सामग्रियाँ, मनोरंजन के सामान, आदि। हालाँकि, उपभोक्ता सामग्रियों को भी दो हिस्सों (टिकाऊ उपभोक्ता सामग्रियाँ और ग़ैर-टिकाऊ उपभोक्ता सामग्रियाँ) में बाँटा जाता है, लेकिन अभी इस विभाजन के विश्लेषण में जाने की हमें कोई आवश्यकता नहीं होती है। एक-एक उपभोक्ता सामग्री के उत्पादन में कई-कई पूँजीपति लगे होते हैं और अपने माल को बेचने के लिए प्रतिस्पर्द्धा करते हैं। इसके लिए वे अख़बारों, टी.वी., रेडियो, बिजली के खम्भों, होर्डिंगों, बस स्टापों और रेलवे स्टेशनों पर मौजूद प्रचार पट्टियों पर प्रचार करते हैं और अपने माल को सबसे अच्छा बताते हैं।

यही हाल, उत्पादन के साधनों के उत्पादन के सेक्टर में भी होता है, लेकिन थोड़ा भिन्न रूप में। इस सेक्टर में मशीनों, उपकरणों और औज़ारों और साथ ही कई प्रकार के माध्‍यमिक कच्चे माल का उत्पादन किया जाता है। यहाँ पर उत्पादित सामग्री का उपभोक्ता आम आदमी नहीं होता, बल्कि पूँजीपति वर्ग होता है जो अपने उत्पादन के लिए उत्पादन के साधनों को पूँजीपति वर्ग के उस हिस्से से ख़रीदता है जो उत्पादन के साधनों का उत्पादन करता है। आजकल यह विभाजन बहुत क्षीण हो गया है क्योंकि एक ही पूँजीपति ने उपभोक्ता सामग्रियों के उत्पादन में भी निवेश कर रखा है और उत्पादन के साधनों के उत्पादन में भी। लेकिन इससे विश्लेषण में कोई फर्क नहीं पड़ता है। उत्पादन के दोनों सेक्टरों में उत्पादन और श्रम की स्थितियों का विश्लेषण किया जा सकता है। लेकिन अभी हमारा उद्देश्य यह नहीं है। उत्पादन के साधन के उत्पादन के क्षेत्र में भी एक-एक मशीन या उपकरण के उत्पादन में कई-कई पूँजीपति लगे होते हैं और उपभोक्ता सामग्री का उत्पादन करने वाले पूँजीपति वर्ग को अपना उत्पाद बेचने के लिए लुभाने में लगे होते हैं।

विभिन्न वस्तुओं या उत्पादन के साधनों (मशीन, उपकरण आदि) के उत्पादन में अलग-अलग समय पर अलग-अलग स्थितियाँ होती हैं। कभी किसी वस्तु का उत्पादन अधिक लाभदायी होता है तो कभी किसी और वस्तु का। मिसाल के तौर पर, अभी कुछ वर्षों पहले तक विश्व बाज़ार में सूरजमुखी और मेंथा की ज़बरदस्त माँग के कारण भारत में तमाम धनी किसानों और कुलकों ने इनकी खेती शुरू की। कृषि के क्षेत्र में सक्रिय पूँजीपतियों ने बाज़ार में माँग और आपूर्ति की स्थितियों को देखते हुए सूरजमुखी और मेंथा की खेती में पैसा लगाना शुरू किया। लेकिन इन स्थितियों का मूल्यांकन सभी कृषक पूँजीपतियों ने मिलकर संगठित रूप से नहीं किया, बल्कि अलग-अलग किया। जो-जो सूरजमुखी और मेंथा की खेती में आवश्यक भारी पूँजी निवेश और कुशल श्रम की आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम था, उसने इसमें पूँजी लगायी। नतीजा यह हुआ कि इन दोनों ही मालों का अति-उत्पादन हुआ और उनके उत्पाद को ख़रीदने के लिए बाज़ार में पर्याप्त ख़रीदार नहीं रहे। बाज़ार में माँग और आपूर्ति की स्थितियाँ बदल गयीं। अब सूरजमुखी और मेंथा का बाज़ार उतना गर्म नहीं रहा। इस प्रक्रिया में तमाम धनी किसान तबाह हो गये, जिन्होंने भारी पैमाने पर निवेश के लिए बड़े-बड़े ऋण लिये थे। भारत में किसानों द्वारा आत्महत्या का एक बड़ा कारण यह भी रहा है। उनके तबाह होने के साथ खेती में लगी मज़दूर आबादी भी बड़े पैमाने पर बेरोज़गार हुई और छोटे किसान सर्वहाराओं की कतार में शामिल हुए। अब बाज़ार में दूसरे माल ज्यादा फायदेमन्द बन गये हैं, जो शायद पहले उतने फायदेमन्द नहीं थे। पहले उनमें पर्याप्त पूँजी लगी हुई थी और उनका उत्पादन माँग से ज्यादा हो रहा था। इसी कारण उनमें से पूँजी निकलकर उन फसलों के उत्पादन में लगी जिनकी माँग अधिक थी, लेकिन पूँजी निवेश कम था। इसी तरह से पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में पूँजी अधिक मुनाफे वाली वस्तुओं के उत्पादन के क्षेत्र की ओर स्वाभाविक गति करती रहती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये क्षेत्र बदलते रहते हैं और पूँजी अराजक तरीके से कभी इस तो कभी उस क्षेत्र की ओर भागती रहती है। यह प्रक्रिया पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में एक सन्तुलनकारी प्रक्रिया होती है जिसे काग़ज़ पर देखा जाये तो बहुत सामान्य लगती है, लेकिन वास्तव में घटित होते हुए देखा जाये तो समझ में आता है कि यह कितनी तबाही लाने वाली प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में लाखों-लाख मज़दूर तबाह होते रहते हैं, अपनी नौकरियों से हाथ धोते रहते हैं और नर्क जैसे जीवन की ओर धकेले जाते रहते हैं। यही पूँजीवादी व्यवस्था की अराजकता का मूल है। एक निजी मालिकाने पर आधारित व्यवस्था जिसमें समाज की आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादन नहीं किया जाता, बल्कि हर पूँजीपति अपने मुनाफे की ख़ातिर बाज़ार में एक-दूसरे से प्रतिस्पर्द्धा के लिए उतरता है। इस पूरी प्रक्रिया में पूँजीपतियों का एक हिस्सा तबाह होकर मध्‍यम वर्ग, निम्न मध्‍यम वर्ग और सर्वहारा वर्ग की कतार में शामिल होता रहता है और लाखों-करोड़ों की संख्या में मज़दूर अपना काम खोते हैं और बेरोज़गारों की कतार में शामिल होते रहते हैं। अपनी अराजक गति से पूँजीवाद मज़दूरों को बरबाद करता रहता है और उन्हें बेरोज़गारों की फौज में धकेलता रहता है। यह एक मानव-केन्द्रित नहीं बल्कि मुनाफा-केन्द्रित व्यवस्था होती है।

पूँजीवाद में विभिन्न सेक्टरों में मन्दी की स्थिति तो आती-जाती रहती ही है। लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था में निश्चित अन्तरालों पर आम संकट की स्थिति पैदा होती रहती है, जब अधिकांश सेक्टरों में अति-उत्पादन हो जाता है और मन्दी पैदा होती है। यह कैसे होता है इसे समझ लेना भी यहाँ उपयोगी होगा।

प्रतिस्पर्द्धा में टिके रहने के लिए हर पूँजीपति अपने उत्पादन की लागत को घटाता है। लागत का अर्थ है उत्पादन में लगने वाली कुल पूँजी। इस पूँजी के दो हिस्से होते हैं पहला, स्थिर पूँजी जो मशीनों, इमारत, बिजली, पानी व कच्चे माल पर लगती है और दूसरा, परिवर्तनशील पूँजी जो पूँजीपति मज़दूरी के रूप में मज़दूरों को देता है। स्थिर पूँजी को स्थिर पूँजी इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान परिवर्तित नहीं होती है। उसका मूल्य सीधे-सीधे, बिना बढ़े हुए उत्पादित माल में स्थानान्तरित हो जाता है। इसमें से कुछ का मूल्य एक बार में भी माल में स्थानान्तरित हो जाता है, जैसे कच्चा माल, बिजली, आदि, और कुछ का मूल्य एक लम्बी प्रक्रिया में माल में स्थानान्तरित होता है, जैसे मशीनें और उपकरण आदि। इनका मूल्य तब तक माल में स्थानान्तरित होता रहता है जब तक कि वे घिसकर बेकार न हो जायें और उनकी उम्र पूरी न हो जाये। एक बार के उत्पादन में उसके कुल मूल्य का एक हिस्सा उत्पाद में जाता है। इसे घिसाई मूल्य (डेप्रिसियेशन वैल्यू) कहा जाता है। लेकिन यह मूल्य भी उत्पादन के दौरान बढ़ता-घटता नहीं है। यह ज्यों का त्यों उत्पाद में चला जाता है। इसीलिए मशीनों और कच्चे माल पर लगने वाली पूँजी को स्थिर पूँजी कहा जाता है। मज़दूरी के रूप में लगने वाली पूँजी को परिवर्तनशील पूँजी कहा जाता है, क्योंकि मज़दूर का श्रम ही वह चीज़ है जो वस्तुओं के एक अनुपयोगी समूह को मशीनों, उपकरणों आदि के इस्तेमाल से एक उपयोगी माल का रूप देता है। श्रम ही उत्पादन का वह कारक है जो किसी उत्पाद में उपयोग मूल्य पैदा करता है, यानी, उसे उपयोगी बनाता है। कोई कारख़ाना या मशीन अपने से कच्चे मालों को एक उपयोगी माल का रूप नहीं दे सकते। जब तक कच्चे मालों पर मानसिक और शारीरिक मानवीय श्रम नहीं लगता, वे मूल्यहीन बेकार वस्तुएँ होती हैं। जैसे ही उस मज़दूर की मेहनत लगती है वे आकार ग्रहण करने लगते हैं और मिलकर एक उपयोगी वस्तु बन जाते हैं। जब कोई वस्तु उपयोगी होगी तभी उसे बाज़ार में कोई ख़रीदेगा। वस्तु में उपयोग मूल्य मज़दूर की मेहनत पैदा करती है। एक पूँजीवादी समाज में मज़दूर की श्रम-शक्ति भी एक माल होती है और वह भी बाज़ार में बिकती है। इसकी कीमत भी बाज़ार में श्रम-शक्ति की माँग और आपूर्ति से तय होती है। उत्पादन की प्रक्रिया में श्रम-शक्ति ही वह कारक होती है जिसका मूल्य संवर्धित होकर, यानी बढ़कर माल में स्थानान्तरित होता है। इसीलिए श्रम-शक्ति को ख़रीदने के लिए पूँजीपति द्वारा लगायी गयी पूँजी को परिवर्तनशील पूँजी कहते हैं क्योंकि उत्पादन से पहले और उत्पादन के बाद इसका परिमाण बढ़ चुका होता है। यह बढ़ी हुई मात्रा अर्थशास्त्र की भाषा में अतिरिक्त मूल्य कहलाती है। यही अतिरिक्त मूल्य एक पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजीपति वर्ग के मुनाफे का मूल होता है। यह पैदा मज़दूर के श्रम द्वारा होता है, लेकिन इसे पूँजीपति द्वारा हड़प लिया जाता है।

चूँकि अतिरिक्त मूल्य ही पूँजीपति के मुनाफे का मूल होता है, इसलिए वह उसे हर कीमत पर बढ़ाने का प्रयास करता है। इससे पूँजीपति वर्ग दो तरह से बढ़ाता है। एक, मज़दूर के काम के घण्टे को बढ़ाकर और उसकी मेहनत की सघनता को बढ़ाकर; और दूसरा, और अधिक उन्नत मशीनें लगाकर। पहले तरीके को समझना आसान है। अगर मज़दूर उसी मज़दूरी पर या थोड़ी-सी बढ़ी मज़दूरी पर अधिक देर तक काम करेगा तो अधिक अतिरिक्त मूल्य पैदा करेगा। यह एकदम सीधा मामला है। दूसरा तरीका थोड़ा जटिल है। आइये इसे भी समझ लें। अगर उन्नत मशीनें लगेंगी तो मज़दूर का श्रम अधिक उत्पादक हो जायेगा और वह अधिक दर से अतिरिक्त मूल्य पैदा करेगा। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिये कि एक सिलाई कारख़ाना है जहाँ मज़दूर पैर से चलने वाली सिलाई मशीन पर काम करते हैं। अभी एक मज़दूर 12 घण्टे में 10 कमीज़ें तैयार करता है। कारख़ाने का मालिक पैर से चलने वाली सिलाई मशीन को हटाकर बिजली से चलने वाली सिलाई मशीनें लगवा देता है। अब वही मज़दूर 12 घण्टे में 18 कमीज़ें बना लेता है। यानी मज़दूर के उत्पादन करने की गति को बढ़ा दिया गया। अब उत्पादन सीधे 1.8 गुना बढ़ गया। इसके लिए पूँजीपति को एक बार थोड़ा निवेश करना पड़ता है, लेकिन बदले में लम्बे समय तक वह बढ़ी हुई उत्पादकता पर काम करवा सकता है। इसके बदले में पूँजीपति मज़दूर को या तो कुछ नहीं देता और या फिर उनकी मज़दूरी को नाममात्र के लिए बढ़ा देता है। मज़दूर यह समझ भी नहीं पाता कि उसका शोषण बढ़ गया है और वह स्वयं कुछ पाये बिना पूँजीपति के मुनाफे को कहीं तेज़ गति से बढ़ा रहा है।

स्पष्ट है कि कुल निवेश में पूँजीपति लागत के अनुपात को घटाने के लिए अतिरिक्त मूल्य को विभिन्न तरीकों से बढ़ाता है। यह काम वह तभी कर सकता है जब वह उत्पादन को बड़े से बड़े पैमाने पर करे। उत्पादन जितने बड़े पैमाने पर होता है, लागत का अनुपात कुल निवेश में उतना कम होता जाता है। अतिरिक्त मूल्य को बढ़ाने के लिए पूँजीपति जिन तरीकों का उपयोग करता है, उससे उत्पादन स्वत: ही बड़े पैमाने पर होता जाता है। यानी, पूँजीपति लगातार इस होड़ में रहता है कि उत्पादन को अधिकतम सम्भव बड़े पैमाने पर किया जाये ताकि अतिरिक्त मूल्य को बढ़ाया जा सके और लागत के अनुपात को कुल पूँजी निवेश में घटाया जा सके। लेकिन इस उत्पादन को बढ़ाने की अन्‍धी हवस में वह यह भूल जाता है कि उत्पाद को ख़रीदने के लिए बाज़ार में उतने ही ख़रीदार भी होने चाहिए। ऐसा किसी एक पूँजीपति के साथ नहीं बल्कि समूचे पूँजीपति वर्ग के साथ होता है। आपसी प्रतिस्पर्द्धा और एक-दूसरे को लील जाने की हवस में हर पूँजीपति हर वस्तु के उत्पादन के क्षेत्र में उत्पादन को लाभदायक होने की हदों से आगे बढ़ाता जाता है और उस पूरे सेक्टर में ही अति-उत्पादन हो जाता है। यही प्रक्रिया सभी क्षेत्रों में घटित होती रहती है। और निश्चित अन्तरालों पर ऐसा होता है कि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के अधिकांश क्षेत्र अति-उत्पादन का शिकार हो जाते हैं और पूरी अर्थव्यवस्था मन्दी का शिकार हो जाती है। यहाँ यह समझना भी ज़रूरी है कि पूँजीवादी उत्पादन की गति ही ऐसी होती है जो समाज में ख़रीदने की क्षमता से लैस लोगों की संख्या घटाती जाती है। पूँजीपति मज़दूर को लगातार लूटकर ही अपने मुनाफे को बढ़ाता है। जब वह उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्नत मशीनों को लगाता है तो मज़दूरों के एक हिस्से को वह निकाल बाहर करता है, क्योंकि अब कम मज़दूर ही उन्नत मशीनों पर उत्पादन को पहले के स्तर से आगे बढ़ा सकते हैं। इस प्रक्रिया में समाज में बेरोज़गारों की फौज बढ़ती जाती है और बहुसंख्यक आबादी अपनी ख़रीदने की क्षमता से वंचित होती जाती है। इस तरह एक तरफ तो उत्पादन बढ़ता जाता है, बाज़ार सामानों से पटता जाता है और दूसरी तरफ उन्हें ख़रीदने वालों की संख्या लगातार घटती जाती है। यही है पूँजीवाद का संकट जो उसे निश्चित अन्तरालों पर, पहले से भी भयावह रूप में आकर सताता रहता है और उसे लगातार उसकी कब्र की ओर धकेलता रहता है। यह एक ऐसा संकट है जिससे पूँजीवादी व्यवस्था लाख चाहने पर भी निजात नहीं पा सकती है, क्योंकि एक योजनाबद्ध मानव-केन्द्रित व्यवस्था में ही इससे निजात मिल सकती है, जो उत्पादन के साधनों और समाज के पूरे ढाँचे पर मज़दूरों के साझे मालिकाने के ज़रिये ही सम्भव है। पूँजीवाद अगर ऐसा हो जायेगा तो वह पूँजीवाद रह ही नहीं जायेगा और इस व्यवस्था को चलाने वाला पूँजीपति वर्ग कभी भी अपने निजी मुनाफे को छोड़ नहीं सकता। इसलिए पूँजीवादी व्यवस्था को सिर्फ तबाह किया जा सकता है, इसे सुधारा नहीं जा सकता क्योंकि यह परस्पर प्रतिस्पर्द्धा, निजी मालिकाने और निजी मुनाफे पर टिकी हुई व्यवस्था है।

साम्राज्यवाद के दौर में पूँजीवाद


पूँजीवाद के इसी संकट ने मानवता को दो विश्वयुद्धों की ओर धकेला। 1870 के दशक के बाद से यूरोपीय देशों में पूँजीवाद भयंकर रूप से इस अति-उत्पादन के संकट का शिकार हो गया था। ब्रिटेन, फ्रांस, हॉलैण्ड, पुर्तगाल, स्पेन जैसे कुछ देशों के पास 18वीं शताब्दी के समय से ही स्थापित उपनिवेश थे जिनके कारण वे मालों के अति-उत्पादन को अपने देश के बाहर अपने उपनिवेशों में भी बेच पा रहे थे। साथ ही, मालों के अतिरिक्त अब लागत को और घटाने के लिए सस्ते श्रम को निचोड़ने के लिए पूँजी को भी इन उपनिवेशों में निर्यात कर रहे थे, यानी, वहीं पर कारख़ाने लगाकर गुलाम देशों के सस्ते श्रम को निचोड़ रहे थे। जल्दी ही, यह सम्भावना भी निश्शेष हो गयी और 1910 का दशक आते-आते विश्व पूँजीवाद फिर से अति-उत्पादन और मन्दी के संकट का शिकार हो गया। साथ ही, कई ऐसे यूरोपीय पूँजीवादी देशों की शक्ति का उदय हुआ जिनके पास उपनिवेश नहीं थे। ऐसे देशों में अगुआ था जर्मनी। इन देशों में पूँजीवाद के संकट के पैदा होने के साथ और इनकी आर्थिक और सैन्य ताकत के पैदा होने के साथ विश्व पैमाने पर ग़रीब देशों की पूँजीवादी लूट के फिर से बँटवारे का सवाल पैदा हो गया। इसी सवाल को हल करने के लिए पूँजीवादी देशों के शासक वर्ग ने पूरी दुनिया को पहले साम्राज्यवादी महायुद्ध में धकेल दिया। इसमें जर्मनी और उसके मित्र देशों को पराजय का सामना करना पड़ा। लेकिन इस युद्ध ने रूस की महान क्रान्ति के लिए भी उपजाऊ ज़मीन तैयार की। दरअसल, यही ज़मीन जर्मनी में भी तैयार हुई थी, लेकिन वहाँ के सामाजिक जनवाद की ऐतिहासिक ग़द्दारी और काउत्स्की के नेतृत्व में पूरी सामाजिक जनवादी पार्टी के साम्राज्यवादी पूँजीवाद की गोद में बैठ जाने के कारण वहाँ क्रान्ति नहीं हो सकी, हालाँकि जर्मनी का मज़दूर आन्दोलन रूस के मज़दूर आन्दोलन से अधिक शक्तिशाली और पुराना था। विश्वयुद्ध में जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी की पराजय के बाद के दौर में रूस में समाजवाद के तहत वहाँ के मज़दूर वर्ग ने अभूतपूर्व तरक्की करके पूरी दुनिया के सामने एक अद्वितीय मॉडल खड़ा कर दिया। दूसरी ओर, पहले विश्वयुद्ध में हथियार बेचकर और ऋण देकर संयुक्त राज्य अमेरिका ने ज़बरदस्त मुनाफा कमाया। लेकिन एक दशक बीतते-बीतते संयुक्त राज्य अमेरिका में ही पूँजीवाद के अब तक के सबसे बड़े संकट का उदय हुआ जिसे महान मन्दी के नाम से जाना जाता है। यह 1929 से लेकर 1931 तक चली। इस मन्दी ने रूस को छोड़कर दुनिया के सभी देशों को गम्भीर रूप से प्रभावित किया। विशेष रूप से, अमेरिका और यूरोपीय देशों को। इस मन्दी के बाद ही जर्मनी और इटली में फासीवाद ने मज़बूती से पैर जमा लिये। महामन्दी ने जर्मनी और इटली में फासीवाद को कैसे पैदा और मज़बूत किया, अन्य देशों में फासीवाद पाँव क्यों नहीं जमा पाया, इन सवालों पर हम आगे विचार करेंगे। पहले, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संकट के इतिहास पर, कुछ शब्द और।

द्वितीय विश्वयुद्ध में सबसे कम नुकसान संयुक्त राज्य अमेरिका को हुआ और सबसे अधिक नुकसान सोवियत रूस को। पूरा यूरोप भी खण्डहर में तब्दील हो चुका था। अमेरिका ने यूरोप और जापान के पुनर्निर्माण के ज़रिये निवेश की सम्भावनाओं का उपयोग किया और अपनी मन्दी को कम-से-कम तीस वर्षों के लिए टाल दिया। 1950 से लेकर 1970 तक अमेरिकी पूँजीवाद ने ख़ूब मुनाफा पीटा। 1960 के दशक को तो अमेरिका में 'स्वर्ण युग' के नाम से जाना जाता है। अति-उत्पादन के संकट को दूर करने के लिए पूँजीवाद के दायरे के भीतर एक ही विकल्प होता है उत्पादक शक्तियों का बड़े पैमाने पर विनाश ताकि उनके पुनर्निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर सम्भावनाएँ पैदा की जा सकें। यह विनाश समय-समय पर साम्राज्यवादी युद्धों के ज़रिये किया जाता है। 1970 का दशक आते-आते विश्व पूँजीवाद एक बार फिर संकट का शिकार हुआ। इसके बाद वह उबरा ही था कि 1980 के दशक के मध्‍य में फिर से मन्दी ने उसे ग्रस लिया। इसके बाद भूमण्डलीकरण की नीतियों की शुरुआत के साथ विश्व साम्राज्यवाद ने एक नये चरण में प्रवेश किया। भूमण्डलीकरण के दौर में पूँजीवाद ने मन्दी को दूर करने के लिए एक नयी रणनीति का उपयोग किया। वित्तीय पूँजी के प्रभुत्व के इस दौर में पूँजी की प्रचुरता और मन्दी के दोमुँहे संकट को दूर करने के लिए बैंकों के ज़रिये उपभोक्ताओं को ऋण देने की शुरुआत की गयी। मध्‍यम वर्ग तक के लोगों को माल ख़रीदने के लिए ऋण देने की प्रथा को विश्वभर में बड़े पैमाने पर शुरू किया गया। यानी पहले लोगों को ख़रीदने की ताकत से वंचित करके बाज़ार को मालों से पाट दिया गया और फिर जब ख़रीदार नहीं बचे तो ख़ुद ही सूद पर लोगों को पैसा देकर वह माल ख़रीदवाया गया, ताकि मन्दी को कुछ समय के लिए टाला जा सके। लेकिन जल्दी ही मध्‍यवर्ग के भीतर ऋण देकर माल ख़रीदवाने की सम्भावनाएँ समाप्त हो गयीं। इसके बाद, तमाम ऐसे लोगों को भी ऋण देने की शुरुआत की गयी जो उसका सूद चुकाने की क्षमता भी नहीं रखते थे, ताकि अस्थायी रूप से मन्दी का संकट दूर हो सके। जल्दी ही यह सम्भावना भी ख़त्म हो गयी और अब 2006 में शुरू हुई मन्दी के रूप में पूँजीवाद के सामने महामन्दी के बाद का सबसे बड़ा संकट खड़ा है, जिससे निपटने के लिए विश्व भर के पूँजीवादी महाप्रभु द्रविड़ प्राणायाम करने में लगे हुए हैं।

संक्षेप में, पूँजीवाद अपने स्वभाव से ही संकट को समय-समय पर जन्म देता रहता है। संकट से निपटने के लिए युद्ध पैदा किये जाते हैं। लेकिन यह एक अस्थायी समाधान होता है और बेताल फिर से आकर पुरानी डाल पर ही लटक जाता है। साम्राज्यवाद के दौर में विश्व पूँजीवाद ने अपनी कार्यप्रणाली को बदला लेकिन सवा सौ साल बीतते-बीतते उसकी हवा निकल गयी और वह फिर से उसी असमाधेय संकट के सामने खड़ा है।

पूँजीवादी संकट की सम्भावित प्रतिक्रियाएँ

संकट के दौर में बेरोज़गारी तेज़ी से बढ़ती है। संकट के दौर में अति-उत्पादन होने और उत्पादित सामग्री के बाज़ारों में बेकार पड़े रहने के कारण पूँजीपति का मुनाफा वापस नहीं आ पाता है और माल के रूप में बाज़ार में अटका रह जाता है। नतीजतन, पूँजीपति अधिक उत्पादन नहीं करना चाहता है और उत्पादन में कटौती करता है। इसके कारण वह उत्पादन में निवेश को घटाता है, कारख़ाने बन्द करता है, मज़दूरों को निकालता है। 2006 में शुरू हुई मन्दी के कारण अकेले अमेरिका में करीब 85 लाख लोग जून 2009 तक बेरोज़गार हो चुके हैं। भारत में मन्दी की शुरुआत के बाद करीब 1 करोड़ लोग अपनी नौकरियों से हाथ धो चुके हैं। बेरोज़गारों की संख्या में पूरे विश्व में करोड़ों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। इसके कारण न सिर्फ तीसरी दुनिया के ग़रीब पिछड़े पूँजीवादी देशों में बल्कि यूरोप के देशों में भी दंगे हो रहे हैं। यूनान, फ्रांस, इंग्लैण्ड, आइसलैण्ड, आदि देशों में पिछले दिनों हुए दंगे और आन्दोलन इसी मन्दी का असर हैं। इस मन्दी के कारण पैदा हुए जन-असन्तोष का पूरे विश्व के पूँजीवादी देशों में शासक वर्ग का जो जवाब सामने आया है उसमें कुछ भी नया नहीं है। यह जवाब है कल्याणकारी राज्य का कीन्सियाई नुस्खा। यह ''कल्याणकारी'' राज्य क्या करता है, इसे भी समझना ज़रूरी है।

मन्दी के कारण जो वर्ग सबसे पहले तबाह होते हैं, वे हैं मज़दूर वर्ग, ग़रीब और निम्न मध्‍यम किसान, खेतिहर मज़दूर वर्ग, शहरी निम्न मध्‍यम वर्ग और आम मध्‍यम वर्ग। यह कुल जनता का करीब 90 प्रतिशत होते हैं। इसके अतिरिक्त, छोटे व्यापारियों और दलालों का भी एक वर्ग इसमें तबाह होता है। इसके कारण पूरे समाज में ही 90 प्रतिशत बहुसंख्यक आबादी के लिए एक भयंकर आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा का माहौल पैदा होता है। इसके कारण भारी पैमाने पर व्यापक और सघन जन-असन्तोष पैदा होता है जो पूरी व्यवस्था के लिए ही एक ख़तरा साबित हो सकता है। इस ख़तरे से निपटने के लिए 1930 के दशक में पूँजीवाद के एक कुशल हकीम जॉन मेनॉर्ड कीन्स ने बताया कि अराजकतापूर्ण पूँजीवादी व्यवस्था को थोड़ा-थोड़ा व्यवस्थित करने की आवश्यकता होती है। अगर निजी प्रतिस्पर्द्धा वाले पूँजीवाद और इजारेदारियों को मुक्त बाज़ार में खुल्ला छोड़ दिया जायेगा तो पूँजी की अराजक गति आत्मघाती रूप से ऐसे हालात पैदा कर देगी जो पूँजीवाद को ही निगल जायेंगे। इसलिए थोड़ा संयम बरतने की ज़रूरत है। इस व्यवस्थापन के काम को पूँजीवाद राज्य को अंजाम देना होगा। इसे कुछ ऐसी नीतियों में निवेश करना होगा जो लोगों को थोड़ा सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा का आभास कराये। मिसाल के तौर पर, सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक सेक्टर) को खड़ा करके उसमें रोज़गार देना होगा; बीमा योजनाएँ लागू करनी होंगी; कुछ अवसंरचनागत क्षेत्र जैसे परिवहन, संचार, आदि को सरकार को अपने हाथ में रखना होगा; निजी क्षेत्र पर कुछ लगाम रखनी होगी; लोगों को आवास आदि की कुछ योजनाएँ देनी होंगी; मज़दूरों की मज़दूरी को थोड़ा बढ़ाना होगा, आदि। यानी कुछ सुधार के कदम जो कुछ समय के लिए लोगों के असन्तोष पर ठण्डे पानी का छिड़काव कर सकें। ऐसे काम करने वाले राज्य को ही ''कल्याणकारी'' राज्य कहा जाता है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि यह कल्याणकारी राज्य पूँजीवाद के दूरगामी कल्याण के लिए और जनता के मन में फौरी कल्याण का एक झूठा अहसास पैदा करने के लिए खड़ा किया जाता है।

लेकिन इस कल्याणकारी राज्य के साथ दिक्कत यह होती है कि इसके अपने ख़र्चे बहुत होते हैं। तमाम कल्याणकारी नीतियों को लागू करने के लिए सरकार को पूँजीपतियों के मुनाफे पर थोड़ी लगाम कसनी पड़ती है और मज़दूरों को थोड़ी रियायतें और छूट देनी पड़ती है। जिन देशों में पूँजीवाद सामन्तवाद विरोधी क्रान्तियों के ज़रिये आया और जहाँ पूँजीवाद विकास की एक गहरे तक पैठी हुई लम्बी प्रक्रिया सामने आयी, वहाँ पर पूँजीपति वर्ग आर्थिक रूप से इस हालत में था कि कल्याणकारी राज्य के ''ख़र्चे उठा सके'' और राजनीतिक रूप से भी इतना चेतना-सम्पन्न था कि कल्याणकारी राज्य को कुछ समय तक चलने दे और कुछ इन्तज़ार के बाद, दोबारा ''छुट्टा साँड ब्राण्ड'' पूँजीवाद की शुरुआत करे। जिन देशों में पूँजीवाद किसी क्रान्तिकारी बदलाव के ज़रिये नहीं, बल्कि एक क्रमश: प्रक्रिया में आया वहाँ कल्याणकारी राज्य के कुछ और ही नतीजे सामने आये। इन देशों में जर्मनी और इटली अग्रणी थे। जर्मनी का पूँजीवाद में संक्रमण किसी पूँजीवादी क्रान्ति के ज़रिये नहीं हुआ। वहाँ पर क्रान्तिकारी भूमि सुधार नहीं लागू हुए, बल्कि सामन्ती भूस्वामियों को ही पूँजीवादी भूस्वामी में तब्दील हो जाने का मौका दिया गया। औद्योगिक पूँजीपति वर्ग राज्य द्वारा दी गयी सहायता के बूते खड़ा हुआ, न कि एक लम्बे पूँजीवादी विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया से, जैसाकि इंग्लैण्ड और फ्रांस में हुआ था। यहाँ के पूँजीपति वर्ग, कुलकों और धनी किसानों की कल्याणकारी राज्य के नतीजों पर इंग्लैण्ड, अमेरिका, और फ्रांस के पूँजीपति वर्ग से बिल्कुल भिन्न प्रतिक्रिया रही। इन शासक वर्गों की अलग किस्म की प्रतिक्रिया ने जर्मनी और इटली में फासीवाद के उदय की ज़मीन तैयार की। इसके अतिरिक्त, एक और कारक था जिसने फासीवाद के उभार में बहुत बड़ी भूमिका निभायी। यह कारक था जर्मनी और इटली के सामाजिक जनवादी आन्दोलन की ग़द्दारी और मज़दूर वर्ग के आन्दोलन का पूँजीवाद की चौहद्दियों के भीतर ही घूमते रह जाना। जर्मनी की सामाजिक जनवादी पार्टी के नेतृत्व में जर्मनी में एक बहुत शक्तिशाली मज़दूर आन्दोलन था जिसने 1919 से लेकर 1931 तक राज्य से मज़दूरों के लिए बहुत से अधिकार हासिल किये। जर्मनी में मज़दूरों की मज़दूरी किसी भी यूरोपीय देश से अधिक थी। कुल राष्ट्रीय उत्पाद में मज़दूर वर्ग का हिस्सा यूरोप के किसी भी देश के मज़दूर वर्ग के हिस्से से अधिक था। लेकिन इससे आगे सामाजिक जनवाद और कोई बात नहीं करता था। वह इसी यथास्थिति को बरकरार रखना चाहता था और इसलिए मज़दूर वर्ग के आन्दोलन को सुधारवादी संसदवाद और अर्थवाद की अन्‍धी चक्करदार गलियों में घुमाता रहा। लेकिन दूसरी तरफ जर्मनी का पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग को मिली इन रियायतों और सुविधाओं को बर्दाश्त करने की ताकत खोता जा रहा था, क्योंकि इसके कारण पूँजी संचय की उसकी रफ्तार बेहद कम हो गयी थी, यहाँ तक कि ठहर गयी थी। इसके कारण विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा में उसका टिक पाना बेहद मुश्किल हो गया था। 1928 आते-आते जर्मनी संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद सबसे अधिक औद्योगिक उत्पादन वाला देश बन चुका था और उत्पादकता की रफ्तार भी अमेरिका के बाद सबसे अधिक थी। इसके साथ ही जर्मनी की विश्व स्तर पर साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा भी अधिक से अधिक तीखी होती जा रही थी। लेकिन घरेलू पैमाने पर मज़दूर वर्ग के शक्तिशाली सुधारवादी आन्दोलन के कारण उसके मुनाफे की दर लगातार कम होती जा रही थी, जिसे इतिहासकारों ने लाभ संकुचन (''प्रॉफिट स्क्वीज़'') का नाम दिया है। ठीक इसी समय, विश्वव्यापी महामन्दी का प्रभाव जर्मनी की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। लाभ संकुचन की मार से बिलबिलाये हुए जर्मन पूँजीपति वर्ग के लिए यह बहुत त्रासद था! इसके कारण सबसे पहले छोटा पूँजीपति वर्ग तबाह होना शुरू हुआ। बड़े पूँजीपति वर्ग को भी भारी हानि उठानी पड़ी। बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी बढ़ी। शहरी वेतनभोगी निम्न मध्‍यम वर्ग में भी बेकारी द्रुत गति से बढ़ने लगी। जो काम कर भी रहे थे उनके सिर पर हर समय छँटनी की तलवार लटक रही थी। इस पूरे असुरक्षा के माहौल ने निम्न पूँजीपति वर्ग, सरकारी वेतनभोगी मध्‍यवर्ग, दुकानदारों, शहरी बेरोज़गारों के एक हिस्से के भीतर प्रतिक्रिया की ज़मीन तैयार की। यही वह ज़मीन थी जिसे भुनाकर राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन मज़दूर पार्टी (हिटलर की नात्सी पार्टी) ने एक प्रतिक्रियावादी जन आन्दोलन खड़ा किया जिसकी अग्रिम कतारों में निम्न पूँजीपति वर्ग, वेतनभोगी मध्‍यम वर्ग, शहरी पढ़ा-लिखा मध्‍यम वर्ग, लम्पट सर्वहारा और यहाँ तक कि सर्वहारा वर्ग का भी एक हिस्सा खड़ा था।

इस असुरक्षा के माहौल के पैदा होने पर एक क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी का काम था पूरी पूँजीवादी व्यवस्था को बेनकाब करके जनता को यह बताना कि पूँजीवाद जनता को अन्तत: यही दे सकता है गरीबी, बेरोज़गारी, असुरक्षा, भुखमरी! इसका इलाज सुधारवाद के ज़रिये चन्द पैबन्द हासिल करके, अर्थवाद के ज़रिये कुछ भत्ते बढ़वाकर और संसदबाज़ी से नहीं हो सकता। इसका एक ही इलाज है मज़दूर वर्ग की पार्टी के नेतृत्व में, मज़दूर वर्ग की विचारधारा की रोशनी में, मज़दूर वर्ग की मज़दूर क्रान्ति। लेकिन सामाजिक जनवादियों ने पूरे मज़दूर वर्ग को गुमराह किये रखा और अन्त तक, हिटलर के सत्ता में आने तक, वह सिर्फ नात्सी-विरोधी संसदीय गठबन्‍धन बनाने में लगे रहे। नतीजा यह हुआ कि हिटलर पूँजीवाद द्वारा पैदा की गयी असुरक्षा के माहौल में जन्मे प्रतिक्रियावाद की लहर पर सवार होकर सत्ता में आया और उसके बाद मज़दूरों, कम्युनिस्टों, ट्रेड यूनियनवादियों और यहूदियों के कत्ले-आम का जो ताण्डव उसने रचा वह आज भी दिल दहला देता है। सामाजिक जनवादियों की मज़दूर वर्ग के साथ ग़द्दारी के कारण ही जर्मनी में फासीवाद विजयी हो पाया। जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी मज़दूर वर्ग को संगठित कर पाने और क्रान्ति में आगे बढ़ा पाने में असफल रही। नतीजा था फासीवादी उभार, जो अप्रतिरोध्‍य न होकर भी अप्रतिरोध्‍य बन गया।

अगले अंक में हम देखेंगे कि जर्मनी में फासीवाद की विजय किस प्रकार हुई थी। जर्मनी के उदाहरण से हम फासीवाद के उदय के कारणों को और अधिक स्पष्टता से समझ पायेंगे और उसका सामान्यीकरण कर पायेंगे। उस सामान्यीकरण के नतीजों को फिर हम भारत पर लागू करके समझ सकते हैं कि भारत में फासीवाद की ज़मीन किस प्रकार मौजूद है और भारत में मौजूद फासीवादी उभार का मुकाबला यहाँ का क्रान्तिकारी मज़दूर आन्दोलन किस प्रकार कर सकता है।

(अगले अंक में 'जर्मनी में फासीवाद', 'इटली में फासीवाद' और 'भारत में फासीवाद')

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बिगुल पुस्तिकाएं
1. कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन और उसका ढाँचा -- लेनिन

2. मकड़ा और मक्खी -- विल्हेल्म लीब्कनेख़्त

3. ट्रेडयूनियन काम के जनवादी तरीके -- सेर्गेई रोस्तोवस्की

4. मई दिवस का इतिहास -- अलेक्ज़ैण्डर ट्रैक्टनबर्ग

5. पेरिस कम्यून की अमर कहानी

6. बुझी नहीं है अक्टूबर क्रान्ति की मशाल

7. जंगलनामा : एक राजनीतिक समीक्षा -- डॉ. दर्शन खेड़ी

8. लाभकारी मूल्य, लागत मूल्य, मध्यम किसान और छोटे पैमाने के माल उत्पादन के बारे में मार्क्सवादी दृष्टिकोण : एक बहस

9. संशोधनवाद के बारे में

10. शिकागो के शहीद मज़दूर नेताओं की कहानी -- हावर्ड फास्ट

11. मज़दूर आन्दोलन में नयी शुरुआत के लिए

12. मज़दूर नायक, क्रान्तिकारी योद्धा

13. चोर, भ्रष् और विलासी नेताशाही

14. बोलते आंकड़े चीखती सच्चाइयां


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